बिहार के इस मंदिर में दी जाती थी इंसान की बलि, घने जंगल में बसा है ये मंदिर

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बिहार के इस मंदिर में दी जाती थी इंसान की बलि, घने जंगल में बसा है ये मंदिर

 

बिहार के इस मंदिर में किसी समय में यहां नरों की बलि दी जाती थी, लेकिन आज यहां बलि प्रथा को पूर्णतः प्रतिबंधित किया जा चुका है. चंपारण के वाल्मीकीनगर में स्थित यह मंदिर वर्तमान में बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है

क्या आपको पता है कि बिहार के पश्चिम चम्पारण ज़िले में देवी मां का एक ऐसा मंदिर है, जहां कभी मानव की बलि दी जाती थी. वाल्मीकिनगर के घने जंगल में बसा यह मंदिर नर बलि की वजह से ही नर देवी मंदिर के नाम से विख्यात है. आज हम आपको इसकी पूरी जानकारी देंगे

वाल्मिकी भ्रमण के टूर ऑपरेटर शुभम की माने तो, इस मंदिर की स्थापना राजा जासर के पुत्र आल्हा–ऊदल ने सैकड़ों साल पहले की थी. बता दें कि राजा जासर देवी मां के अनन्य भक्त थें. उन्होंने खुद अपनी बलि माता के चरणों में दी थी. देहावसान के पश्चात उनके दोनों बेटों आल्हा और ऊदल ने पिता की इच्छा पूर्ति के लिए मंदिर की स्थापना की थी.

बिहार सरकार की तरफ से जारी पुस्तिका स्मारिका में यह स्पष्ट वर्णित है कि मंदिर में बाघ और अन्य जानवरों का बसेरा था. पर चौंकाने वाली बात यह है कि आज भी मंदिर के आसपास तेंदुआ जैसे खूंखार जानवरों का बसेरा है, लेकिन आज तक किसी भी श्रद्धालु के हताहत होने की ख़बर नहीं आई है.

कभी नरों की बलि दिए जाने वाले इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि वर्तमान में यहां बलि को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है. आज यहां जितने भी पशु बलि के लिए लाए जाते हैं, उन्हें देवी मां के समक्ष आज़ाद कर दिया जाता है. आश्चर्य की बात यह है कि पशु मंदिर का प्रांगण छोड़ कभी बाहर नहीं जाते हैं. ऐसे में प्रांगण में बकरों और पेड़ों पर मुर्गों का भरमार लगा रहता है.

बता दें कि यह मंदिर पश्चिम चम्पारण ज़िले के वाल्मिकी नगर में स्थित है. नवरात्र तो दूर सामान्य दिनों में भी यहां देश के कई राज्यों के अलावे पड़ोसी देश नेपाल से भी श्रद्धालु आते हैं. जंगल के बीच में बसा यह मंदिर चम्पारण के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है, जहां पर्यटक भी बड़ी मात्रा में आते हैं.

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