अब छात्रों के आंदोलन की आग बिहार पहुंच गई है। पटना में छात्रों ने मुख्यमंत्री आवास को घेरने की कोशिश की, पुलिस के साथ टकराव हुआ। पुलिस ने संयम बरता, हल्का लाठीचार्ज किया, वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया। किसी भी प्रदर्शनकारी को चोट नहीं आई लेकिन छात्रों के पथराव में कई पुलिस वालों के सिर फूट गए। छात्र BPSC परीक्षा को रद्द करने की मांग कर रहे हैं, साथ ही चाहते हैं कि शिक्षकों की भर्ती की परीक्षा एक चरण में हो, प्री और मेन्स का concept खत्म किया जाए, निगेटिव मार्किंग न हो।
बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन ने साफ कह दिया है कि इस तरह की मांगें मानना संभव नहीं हैं। छात्र बात करना चाहते हैं, तो सरकार तैयार है। छात्रों की जायज मांगों पर सरकार विचार कर सकती है लेकिन इस तरह सड़क पर उतर कर सरकार को झुकाया नहीं जा सकता। पटना में जो प्रोटैस्ट हुए, उसमें छात्रों की ये मांग तो सही है कि जो भर्तियां पेंडिंग हैं, उनकी परीक्षा जल्द कराई जाय। ये मांग भी सही है कि पेपर लीक कराने वालों के खिलाफ तय वक्त के अंदर कार्रवाई हो, और पूरे सिस्टम में पारदर्शिता हो।
लेकिन एक्सपर्ट्स कमेटी ने परीक्षा को पारदर्शी बनाने का जो तरीका बनाया है, उसे बदलने की मांग कैसे न्यायोचित हो सकती है? दो चरणों में civil services परीक्षा UPSC में भी होती है, Negative marking भी एक्सपर्ट्स कमेटी की सलाह पर की गई। अगर छात्र चाहते हैं कि परीक्षा में हेराफेरी न हो, तो परीक्षा कराने के सिस्टम में बदलाव तो करना ही पड़ेगा। पटना में University of Health Sciences में जो प्रोटैस्ट हुआ, उसकी वजह तो चौंकाने वाली है। फार्मेसी की परीक्षा में नकल नहीं करने दी गई, इसीलिए 90 प्रतिशत छात्र फेल हो गये, इसको लेकर प्रोटैस्ट हुए।
नकल कराकर परीक्षा पास कराने की मांग कौन मान सकता है? अगर परीक्षा प्रणाली को दुरुस्त करना है, मेहनत करने वाले छात्रों को पास होना है तो पेपर लीक और चीटिंग, दोनों पर रोक लगानी होगी। बिना सिस्टम बदले, बिना सख्ती किए ये नहीं किया जा सकता।
सम्राट चौधरी बिहार के स्कूलों की बदहाली पर ध्यान दें
बिहार में स्कूलों की इस समय जो हालत है, वो केवल web portal पर शिकायतें नोट करके और नोटिस भेज कर दूर नहीं हो पाएंगी। इसके लिए युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत है। कुछ उदाहरण बताता हूं। मधेपुरा के बेरवा गांव मे सरकारी मिडिल स्कूल में 159 बच्चे पढ़ते हैं। क्लासरूम सिर्फ दो हैं। शिक्षकों ने आसान रास्ता निकाला है। छठी, सातवीं और आठवीं क्लास के बच्चे एक ही रूम में बैठ कर पढ़ते हैं और दूसरे रूम में तीसरी, चौथी और पांचवी कक्षा के बच्चे बैठते हैं।
एक ही वक्त में तीन अलग अलग कक्षाओं के बच्चों को तीन शिक्षक अलग अलग विषय पढ़ाते हैं। चारों तरफ से ज्ञान की गंगा बहती है। एक छोटे से क्लासरूम में तीन-तीन शिक्षकों की आवाज़ एक साथ गूंजती है। शिक्षक कह रहे हैं कि ये स्कूल 1992 से इसी तरह चल रहा है। सरकार ने नई बिल्डिंग बनाने के लिए पैसे आवंटित किये, लेकिन जमीन का आवंटन नहीं हो पाया, इसलिए फंड वापस लौट गया। यही हाल पटना और दूसरे जिलों के स्कूलों का है।
“आज की बात” में 15 सितंबर 2023 को हमने पटना के एक सरकारी स्कूल की तस्वीरें दिखाई थीं। एक ही कमरे में पांच कक्षाओं के बच्चों की पढ़ाई हो रही थी। एक ही ब्लैकबोर्ड को पांच हिस्सों में बांट कर पांच शिक्षक अलग अलग विषय पढ़ा रहे थे। तीन साल पहले जो तस्वीर थी, वही तस्वीर आज भी दिख रही है। उस वक्त भी बिहार के सरकारी स्कूलों में कमरे नहीं थे, आज भी नहीं हैं। उस वक्त भी सभी कक्षाओं के बच्चे एक साथ बैठकर ज्ञान प्राप्त करते थे, आज भी वही हाल है। उस वक्त भी तबेले में स्कूल चलते थे, आज भी यही हो रहा है।
रोहतास के चेनारी इलाके में भैंसों के पास बैठकर बच्चे गणित का ज्ञान लेते हैं। स्कूल के कैंपेस में गाय भैंसें बांधी जाती हैं। एक कमरे में चारा काटने की मशीन है, दूसरे कमरे में गाय भैंसों के लिए भूसा भरा है। दो कमरे बचते हैं जिनमें बच्चों की क्लास लगती है। इंडिया टीवी की टीम ने पूछा, स्कूल को तबेला किसने बनाया, तो शिक्षकों ने बताया कि गांव के दबंग शख्स ने स्कूल पर कब्जा कर लिया। गांव के सोनू यादव का दावा है कि जिस जमीन पर स्कूल बना है, वो जमीन उसके दादा की थी, सरकार ने बिना किसी समझौते के जमीन पर कब्जा कर स्कूल बनवा दिया। वो कहता है, जमीन उसकी है, इसलिए वो यहां अपनी गाय भैंसे बांधता है।
मैं तो बिहार के उन बच्चों की तरीफ करूंगा जो तबेले में बैठकर पढ़ते हैं और बड़ी-बड़ी परीक्षाएं पास कर जाते हैं। लेकिन सरकारी स्कूलों का ये हाल बिहार सरकार के लिए शर्मनाक है। अगर चालीस साल में सरकार स्कूलों में बच्चों के लिए कक्षाओं का इंतजाम न कर पाए, सरकारी स्कूलों में भैंसे बांधी जाएं तो फिर शिक्षकों की नियुक्ति का क्या फायदा? कितना भी अच्छा सिलेबस बन जाए, कितने भी योग्य शिक्षक रख लिए जाएं, अगर स्कूलों में कमरे नहीं होंगे, तो बच्चे क्या पढ़ेंगे और टीचर्स कैसे पढ़ाएंगे? अगर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी इस स्थिति को बदल पाये तो उन्हें सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए।
चुनावी मोड में योगी: युवाओं को नौकरी, महिलाओं को तोहफा
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ऐलान किया है कि उनकी सरकार अगले 6 महीने में एक लाख युवाओं को सरकारी नौकरी देगी। योगी लखनऊ में कल 3,446 कृषि तकनीकी सहायकों और 126 मंडी सचिवों को नियुक्ति पत्र दे रहे थे। योगी सरकार ने कल फैसला किया कि अब यूपी में साठ साल से ज्यादा उम्र की सभी महिलाएं जीवन भर सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा कर सकेंगी, उन्हें सरकारी बस में सिर्फ अपना आधार या वोटर कार्ड दिखाना होगा। ये रक्षाबंधन पर यूपी की बहनों को योगी का गिफ्ट है।
योगी चुनावी मोड में हैं। वह एक के बाद एक ऐसे एलान कर रहे हैं जिसका अखिलेश यादव के पास कोई जवाब नहीं होगा। अब यूपी के 25 लाख नौजवानों को लैपटॉप देने की तैयारी है। इसके लिए 2,354 करोड़ रुपये का बजट रखा है। योगी ने एक और बड़ा काम किया। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों की मरम्मत और पुनर्निर्माण के लिए 604 करोड़ रुपये मंजूर किए। कोशिश है कि बच्चों के लिए जो स्कूल बनाए गए हैं, उनमें बेहतर क्लासरूम बनाए जाएं। योगी ने समय की जरूरत और पब्लिक के मूड को समझा, उसके हिसाब से फैसले लिए।
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