दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि शादी का रिश्ता विश्वास, साथ और भरोसे पर टिका होता है। लेकिन पति-पत्नी के बीच चल रहे विवादों को अगर समय रहते नहीं सुलझाया जाए, तो हालात बिगड़ सकते हैं। कोर्ट ने इसी संदर्भ में कहा कि ‘बेटर हाफ’ यानी जीवनसाथी ही ‘बिटर हाफ’ बन सकता है और रिश्ता विवाद का मैदान बन सकता है। कई बार स्थिति इतनी खराब हो सकती है कि इसमें शारीरिक हिंसा भी शामिल हो जाए।
हाई कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक विवादों को सावधानी और समय पर नहीं संभाला गया तो रिश्ते पूरी तरह से अनचाही और अप्रत्याशित दिशा में जा सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि जिंदगी के कई दर्द समय के साथ ठीक हो जाते हैं, लेकिन रिश्तों के विवाद में देरी उल्टा नुकसान पहुंचा सकती है।
आखिर क्या है मामला
ये टिप्पणियां उस मामले की सुनवाई के दौरान आईं, जिसमें नाफे सिंह पर अपनी पत्नी को जबरन बेगॉन (Baygon) कीटनाशक पिलाकर उसकी हत्या की कोशिश करने का आरोप था। ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी ठहराया था और मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 के तहत हत्या के प्रयास से जुड़ा था।
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस विमल कुमार यादव ने ट्रायल कोर्ट की सजा को पलटते हुए आरोपी को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह संदेह से परे साबित नहीं कर पाया कि आरोपी ने पत्नी को जहरीला पदार्थ इस इरादे या जानकारी के साथ दिया था, जिससे IPC की धारा 307 के तहत अपराध बनता हो।
शादी के एक साल में बिगड़े रिश्ते
बेंच ने यह फैसला नाफे सिंह की उस अपील पर सुनाया, जिसमें उसने ट्रायल कोर्ट के 2004 के फैसले को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने पत्नी की हत्या के प्रयास के मामले में उसे 3 साल की सजा सुनाई थी। हाई कोर्ट ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा के बाद उसकी अपील स्वीकार कर ली।
रिकॉर्ड के मुताबिक, नाफे सिंह और उसकी पत्नी की शादी साल 2000 में हुई थी। हालांकि शादी के करीब एक साल बाद ही दोनों के बीच रिश्ते तनावपूर्ण हो गए। साल 2001 में पति-पत्नी के बीच विवाद के दौरान नाफे सिंह पर आरोप लगा कि उसने पहले गिलास के जरिए पत्नी को ‘बेगॉन’ (Baygon) कीटनाशक पिलाने की कोशिश की। इसमें सफल न होने पर उसने कंटेनर से सीधे उसके गले में कीटनाशक डालने की कोशिश की।
कोर्ट ने कहा कि यह मामला इस बात का उदाहरण है कि शादी के करीब एक साल के भीतर ही पति-पत्नी एक-दूसरे के ‘लॉगरहेड्स’ यानी आमने-सामने और गंभीर टकराव की स्थिति में आ गए। कोर्ट ने वैवाहिक रिश्ते की गंभीरता को समझाते हुए कहा कि शादी विश्वास, साथ और भरोसे का रिश्ता है। लेकिन जब विवाद समय पर नहीं सुलझते, तो यही रिश्ता तनाव और संघर्ष में बदल सकता है।
मेडिकल सबूत कमजोर
हाई कोर्ट ने मेडिकल और फोरेंसिक सबूतों को ‘थोड़ा कमजोर’ बताया। कोर्ट के मुताबिक, पीड़िता को अस्पताल लाए जाने के समय उसके शुरुआती मेडिकल पैरामीटर सामान्य थे और डॉक्टरों को जहर दिए जाने के कोई लक्षण नहीं मिले थे। अस्पताल में पीड़िता के उल्टी करने की बात सामने आई थी, लेकिन कोर्ट ने कहा कि केवल उल्टी होना इस निष्कर्ष के लिए पर्याप्त नहीं है कि उसे जहरीला पदार्थ दिया गया था। मामले में पेट की सफाई के बाद लिए गए गैस्ट्रिक लैवेज को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया था। जांच में उसमें किसी भी जहरीले पदार्थ के अंश नहीं मिले।
कीटनाशक की बॉटल पर विरोधाभास
कोर्ट ने कथित कीटनाशक की बोतल को लेकर भी एक महत्वपूर्ण विरोधाभास पाया। जांच अधिकारी ने कहा था कि बरामद की गई बोतल खाली थी। वहीं फोरेंसिक रिपोर्ट में बताया गया कि बोतल में करीब 4 मिलीलीटर कीटनाशक मौजूद था। कोर्ट के मुताबिक, इस अंतर का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण रिकॉर्ड पर नहीं था।
घायल गवाह की गवाही अहम
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी घटना में घायल व्यक्ति की गवाही को काफी महत्व दिया जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसी गवाही को न्यायिक जांच से अलग रखा जाए। कोर्ट ने कहा कि घायल गवाह की गवाही को आसपास की परिस्थितियों और उपलब्ध मेडिकल व वैज्ञानिक सबूतों के साथ मिलाकर परखा जाना जरूरी है।
घटना के बाद आरोपी का व्यवहार
कोर्ट ने घटना के बाद आरोपी के व्यवहार पर भी गौर किया। कोर्ट के अनुसार, पीड़िता को तुरंत अस्पताल ले जाया गया और उसके इलाज की व्यवस्था की गई। हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपी का यह व्यवहार भी महत्वपूर्ण परिस्थिति है, खासकर तब जब यह देखा जा रहा हो कि क्या आरोपी के पास IPC की धारा 307 के तहत जरूरी इरादा या जानकारी थी।
पीड़िता की गवाही में असंगतियां
कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े कई पहलुओं पर पीड़िता के बयान में असंगतियां भी पाईं। अदालत ने कहा कि इन विरोधाभासों को देखते हुए उसकी गवाही और पूरे सबूतों को ज्यादा सावधानी से परखने की जरूरत थी। सभी परिस्थितियों और उपलब्ध सबूतों को देखते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर आरोपी की सजा बरकरार रखना ‘बेहद असुरक्षित’ होगा।
संदेह का लाभ मिला
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ हत्या के प्रयास के लिए जरूरी इरादा और जानकारी संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की सजा को पलटते हुए नाफे सिंह को बरी कर दिया।
(इनपुट- ANI)








