अधिकांश लोग सफलता की खोज में जीवन बिताते हैं. लेकिन एक समय ऐसा आता है जब अनुभव होता है कि मन की सबसे बड़ी खोज सफलता नहीं, बल्कि भीतर की स्वतंत्रता है. क्या आपने कभी सोचा है कि जीवन में सब कुछ होते हुए भी भीतर एक अनकही बेचैनी क्यों बनी रहती है? अच्छी नौकरी, परिवार, सुविधाएं और उपलब्धियां होने के बाद भी मन किसी गहरे संतोष की खोज में लगा रहता है. भारतीय अध्यात्म में इसे एक विशेष सौभाग्य माना गया है क्योंकि मुक्ति की इच्छा तभी जन्म लेती है जब चेतना जागने लगती है.
राजा जनक ने देखा स्वप्न
प्राचीन कथा के अनुसार एक दिन मिथिला के राजा जनक अपने राज्य के कार्यों और समाचारों को सुन रहे थे. तभी उन्हें हल्की-सी झपकी आ गई और उन्होंने एक विचित्र स्वप्न देखा. स्वप्न में उनके पूरे राज्य में भीषण अकाल पड़ा हुआ था. वे स्वयं भोजन की तलाश में दर-दर भटक रहे थे और लोगों से भिक्षा मांग रहे थे. लंबे भटकाव के बाद किसी ने उन्हें एक रोटी दी. वे जैसे ही उसे खाने वाले थे, तभी एक बाज झपट्टा मारकर वह रोटी ले उड़ा. उसी क्षण उनकी नींद खुल गई और उन्होंने स्वयं को भूखा पाया.आंखें खुलीं तो देखा कि वे राजसभा में बैठे हैं. उनके भीतर एक गहरा प्रश्न उठ खड़ा हुआ- क्या वह स्वप्न वास्तविक था या यह वर्तमान जीवन ही किसी स्वप्न के समान है? सत्य क्या है? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए उन्होंने अनेक विद्वानों से चर्चा की. अंततः उन्हें सलाह दी गई कि वे महर्षि अष्टावक्र की शरण लें, जिनका शरीर आठ स्थानों से विकृत था, किंतु जिनकी चेतना परम ज्ञान में स्थित थी.
अष्टावक्र ने बताया उपाय
महर्षि अष्टावक्र को राजसभा में आमंत्रित किया गया. यह एक अद्भुत संगम था. एक ओर ऐसा राजा जिसने जीवन के समस्त वैभव और उपलब्धियों का अनुभव किया था, किंतु सत्य की खोज में था. दूसरी ओर ऐसा ऋषि, जो अस्तित्व की परम ऊंचाइयों को प्राप्त कर चुका था. राजा जनक का उनके साथ हुआ संवाद ही आगे चलकर ‘अष्टावक्र गीता’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ. राजा जनक ने अष्टावक्र से पूछा, “मैं मुक्त कैसे होऊँ?” उन्होंने राज्य और जिम्मेदारियों से पलायन नहीं किया, बल्कि संसार के बीच रहते हुए अनासक्त रहने की कला जानना चाही.
प्रश्न यह है कि जनक मुक्ति क्यों चाहते थे? ऐसा क्या है जो मनुष्य के भीतर स्वतंत्र होने की आकांक्षा जगाता है? क्या आपने कभी इस पर विचार किया है? जब कोई व्यक्ति गहरी नींद में होता है, तब उसे इस बात का कोई भान नहीं रहता कि वह कारागार में है या राजमहल में. नींद की अवस्था में बंधन का अनुभव नहीं होता. किंतु जनक बंधन को महसूस कर रहे थे और इसका अर्थ है कि उनकी चेतना जाग चुकी थी.
तो फिर स्वतंत्रता क्या है?
स्वतंत्रता का अर्थ है उन मानसिक प्रवृत्तियों, आदतों और जीवन-शैलियों से मुक्त होना, जो दुःख का कारण बनती हैं. लोग दुःखों से मुक्ति चाहते हैं, सुखों से नहीं. किंतु जीवन की अधिकांश आदतें वास्तव में आनंद नहीं देतीं, उनकी अनुपस्थिति मात्र हमें बेचैन कर देती है. सुबह की चाय या कॉफी का उदाहरण लें. वह हमें कोई असाधारण आनंद नहीं देती, लेकिन यदि वह न मिले तो बेचैनी होने लगती है. यही निर्भरता धीरे-धीरे बंधन का रूप ले लेती है. आधुनिक जीवन में भी मोबाइल फोन, सोशल मीडिया या दूसरों की स्वीकृति की चाह कई बार इसी प्रकार की अदृश्य कैद बन जाती है. आध्यात्मिक दृष्टि से स्वतंत्रता का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि उसके बीच रहते हुए सहज और सजग बने रहना है. अष्टावक्र के अनुसार हमारी इंद्रियां हमें किसी वस्तु के पक्ष या विपक्ष में खड़ा कर देती हैं. यदि हम किसी चीज से अत्यधिक आकर्षित होते हैं या किसी के प्रति गहरा द्वेष रखते हैं, तब मुक्त नहीं हो सकते. जीवन का स्वभाव विकास की ओर जाना है अर्थात जो हमारी चेतना को ऊपर उठाए, उसे अपनाना और जो भीतर विष पैदा करे, उसे छोड़ना ही विवेक है. यह त्याग दबाव से नहीं, समझ से आता है.
पांच जीवन मूल्यों को समझिए
इस दिशा में पांच जीवन-मूल्य विशेष रूप से सहायक बताए गए हैं- क्षमा, निष्ठा, दया, संतोष और सत्य. स्वयं को क्षमा करना पहला सिद्धांत है. जो कुछ हुआ, वह हो चुका है, उस पर अत्यधिक विचार न करें. यदि आप स्वयं को क्षमा नहीं कर सकते, तो आपने स्वयं को अतीत से बांध लिया है. यदि निष्ठा न हो तो स्वयं को क्षमा करते रहने में कोई बड़ी बात नहीं. स्वयं और दूसरों के प्रति कठोर न हों, दया का भाव रखें. कुंठित व्यक्ति स्वयं और दूसरे के प्रति संवेदनशील नहीं हो सकता. यदि ध्यान दें, तो पाएंगे कि आपको चिंता छोटी चीजों की ही है. हम ऐसे जीते हैं मानो हम सदा के लिए जीने वाले हैं. हम जीवन के प्रवाह में बह जाते हैं और समय के प्रति सजगता खो बैठते हैं. जागिए और तृप्त हो जाइए. कोई यहां सदा के लिए नहीं रहने वाला है.
पांचवां सिद्धांत है- सत्य. जो अभी, इसी क्षण विद्यमान है, वही सत्य है. यह जगत निरंतर परिवर्तनशील है. इसमें सारे लोग बदल रहे हैं, उनके विचार बदल रहे हैं, उनके मन बदल रहे हैं. सब कुछ बदल रहा है, किंतु मनुष्य अक्सर किसी नकारात्मक अनुभव, स्मृति या घटना को पकड़कर बैठ जाता है. जब यह बोध दृढ़ हो जाता है कि संसार की प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है, तब छोटी-बड़ी घटनाएँ आपको विचलित नहीं कर पातीं और तभी वास्तविक मुक्ति का अनुभव होता है.
इन सिद्धांतों को केवल पढ़िए नहीं, इन्हें अपने जीवन में उतारिए. क्षमा, निष्ठा, दया, संतोष और सत्य- इन पाँचों को जीवन का अमृत बनाइए. जब ये मूल्य आपके विचारों और व्यवहार का हिस्सा बन जाते हैं, तब बंधन स्वतः ढीले पड़ने लगते हैं और जीवन अधिक सहज, शांत तथा मुक्त अनुभव होने लगता है. जीवन का उद्देश्य हर इच्छा को पूरा करना नहीं, बल्कि उन बंधनों को पहचानना है जो हमें स्वयं से दूर ले जाते हैं. जिस दिन यह पहचान जाग जाती है, उसी दिन मुक्ति की यात्रा आरंभ हो जाती है.









