वो घर देर से आती है…’ कमाऊ और आजाद खयाल बहू से क्यों असुरक्षित महसूस करती हैं सास और ननद?

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रात के ठीक 9:30 बजे थे. ड्रॉइंग रूम की दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक के बीच सोफे पर बैठीं कमला जी की नजरें लगातार दरवाजे पर टिकी थीं. उनके ठीक बगल में बैठीं उनकी बेटी रीना बार-बार अपने फोन को स्क्रॉल कर रही थी, लेकिन उसका ध्यान भी बाहर से आने वाली गाड़ियों की आवाज पर था.

जैसे ही दरवाजे की घंटी बजी, कमला जी ने गहरी सांस छोड़ी और रीना ने बुदबुदाते हुए कहा, “देखा मम्मी, आ गई आपकी लाडली बहू! रोज का यही नाटक है.” दरवाजा खुला और ऑफिस की थकान चेहरे पर समेटे अंजलि ने अंदर कदम रखा. उसके एक हाथ में लैपटॉप बैग था और दूसरे हाथ में सब्जी का थैला.

भारतीय पारिवारिक व्यवस्था पर हुए कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि आज के आधुनिक दौर में भी समाज ‘अच्छी बहू’ का पैमाना घरेलू कामों में उसकी निपुणता और बड़ों की ‘जी-हुज़ूरी’ करने से ही नापता है.

उसने मुस्कुराकर सास और ननद को देखा, लेकिन सामने से मिली सिर्फ एक ठंडी और कड़वी खामोशी. कमला जी ने बिना अंजलि की तरफ देखे कहा, “इतनी रात तक कौन सा दफ्तर खुला रहता है? घर-परिवार की कोई फिक्र ही नहीं है.”

अंजलि, जो एक बड़ी कंपनी में सीनियर मैनेजर है और घर का आधा खर्च खुद उठाती है, बिना कुछ बोले अपने कमरे की तरफ बढ़ गई. उसकी आंखों में हताशा थी और मन में एक ही सवाल, “आखिर आत्मनिर्भर होना और अपने पैरों पर खड़ा होना इस घर में गुनाह क्यों बन गया?”

यह कहानी सिर्फ अंजलि की नहीं है. आज भारत के हजारों मध्यमवर्गीय परिवारों में जब एक कमाऊ, आत्मनिर्भर और आजाद खयाल बहू कदम रखती है, तो घर का माहौल अनजाने में ही तनावपूर्ण हो जाता है. टीवी सीरियल्स ने भले ही इसे ‘सास-बहू की नौटंकी’ का नाम दे दिया हो, लेकिन इसके पीछे गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण छिपे हैं.

आइए जानते हैं कि आखिर विज्ञान और सामाजिक शोध इस बारे में क्या कहते हैं कि एक आजाद ख्याल बहू से सास और ननद असुरक्षित क्यों महसूस करने लगती हैं…
पावर डायनेमिक्स का बदलना (Shift in Power Dynamics)-
मशहूर सोशियोलॉजिस्ट्स और पारिवारिक ढांचों पर रिसर्च करने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक, पारंपरिक भारतीय घरों में ‘सास’ का पद एक अथॉरिटी यानी सत्ता का होता है. सास ने अपनी जिंदगी के कई साल समझौते और त्याग करके उस घर में अपनी एक पोजीशन बनाई होती है. सामाजिक शोध बताते हैं कि जब एक कमाऊ और आजाद खयाल बहू घर में एंट्री लेती है, तो वह आर्थिक रूप से किसी पर निर्भर नहीं होती. वह अपने फैसले खुद लेने की ताकत रखती है. ऐसे में सास को लगने लगता है कि घर पर उनका ‘कंट्रोल’ या उनकी सत्ता छिन रही है. जो बहू आर्थिक रूप से मजबूत है, उसे दबाना आसान नहीं होता, और यही बात सास को अपनी पोजीशन के लिए खतरा लगने लगती है.

जेनरेशन गैप और ‘परफेक्ट बहू’ का पारंपरिक पैमाना-
Journal of Family Studies में यह बात सामने आई है कि आज के आधुनिक दौर में भी समाज ‘अच्छी बहू’ का पैमाना घरेलू कामों में उसकी निपुणता और बड़ों की ‘जी-हुज़ूरी’ करने से ही नापता है.जब एक वर्किंग वुमन अपने काम के सिलसिले में घर देर से लौटती है, तो पारंपरिक सोच रखने वाली सास-ननद को लगता है कि वह पारिवारिक जिम्मेदारियों की अनदेखी कर रही है. मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, यहाँ ‘मदरहुड पेनाल्टी’ और जनरेशन गैप साफ दिखता है. सास को अक्सर यह मलाल या अवचेतन मन (Subconscious mind) में असुरक्षा होती है कि “हमने भी तो करियर और घर के लिए अपनी इच्छाओं का गला घोंटा, यह इतनी बेबाक कैसे है?”

ननद की ‘तुलनात्मक असुरक्षा’ (Comparative Insecurity)-
ननद और भाभी के रिश्ते पर हुए मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि दोनों के बीच की अनबन अक्सर ‘तुलना’ (Comparison) की वजह से शुरू होती है. रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स के अनुसार, अगर ननद खुद उतनी करियर-ओरिएंटेड या आजाद नहीं है, या उसकी शादी की बात चल रही है, तो घर में एक बेहद आधुनिक और आत्मनिर्भर भाभी का आना उसे अपनी स्थिति को लेकर डरा देता है. जब माता-पिता या भाई का ध्यान भाभी की उपलब्धियों या उसकी लाइफस्टाइल पर जाता है, तो ननद को लगता है कि घर में उसकी खुद की अहमियत कम हो रही है.

बेटे और भाई पर से ‘इमोशनल मोनोपोली’ खोने का डर-
मनोविज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार, भारतीय परिवारों में मां और बहन का बेटे या भाई पर एक खास भावनात्मक एकाधिकार (Emotional Monopoly) होता है. एक कमाऊ और आजाद खयाल बहू न सिर्फ अपने पति की आर्थिक मददगार बनती है, बल्कि उसके बड़े फैसलों (जैसे- निवेश, प्रॉपर्टी, या ट्रैवल) में मुख्य भागीदार बन जाती है. ऐसे में सास और ननद को मनोवैज्ञानिक रूप से यह महसूस होने लगता है कि बेटा अब उनके प्रभाव से पूरी तरह बाहर निकलकर पत्नी के फैसलों को ज्यादा तवज्जो दे रहा है.

एक्सपर्ट का क्‍या है कहना
मैरेज काउंसलर्स और साइकोलॉजिस्ट्स का मानना है कि यह असुरक्षा व्यक्तिगत रूप से बहू से नहीं, बल्कि ‘बदलती व्यवस्था’ से है. सदियों से चले आ रहे पितृसत्तात्मक ढर्रे को तोड़कर जब एक महिला खड़ी होती है, तो उसे स्वीकार करना पुराने विचारों के लिए मानसिक रूप से कठिन होता है.

इस समस्या का समाधान ‘ब्लेम गेम’ या तानों में नहीं, बल्कि एक-दूसरे के स्पेस और काम की इज्जत करने में है. एक कमाऊ बहू घर को आर्थिक मजबूती देती है, और उसका देर से आना उसकी मजबूरी या करियर की डिमांड हो सकता है, परिवार के प्रति अनादर नहीं, यह बात आज के परिवारों को समझनी होगी.



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