Co-Living Culture In India : आज के दौर में जब बड़े मेट्रो और आईटी शहरों की लाइफस्टाइल की बात आती है, तो एक नया शब्द तेजी से सुनने को मिलता है- को-लिविंग (Co-Living). कभी सिर्फ विदेशों तक सीमित रहने वाला यह कल्चर अब भारत के बड़े-बड़े आईटी हब्स (जैसे हैदराबाद, बेंगलुरु, पुणे और नोएडा) में पैर पसार चुका है. आलम यह है कि इन शहरों में काम करने वाले युवा बिना शादी के ही खाना, कमरा यहां तक कि बेड (फूड और बेड) तक शेयर कर रहे हैं. यह ट्रेंड तेजी से अपना रहे हैं. लेकिन क्या यह सिर्फ एक नया लाइफस्टाइल ट्रेंड है या इसके पीछे युवाओं की कोई मजबूरी या बदलती सोच है? आइए आसान भाषा में डिकोड करते हैं इस ‘को-लिविंग कल्चर’ को.
क्या है यह को-लिविंग ट्रेंड और क्यों आ रहा युवाओं को पसंद?
को-लिविंग का मतलब है बिना किसी सामाजिक या कानूनी बंधन (शादी) के, दो अलग-अलग लोग अपनी मर्जी से एक ही छत के नीचे पार्टनर की तरह रहते हैं और अपने खर्चों व पर्सनल लाइफ को शेयर करते हैं. विशेषज्ञों और ट्रेंड्स की मानें तो युवाओं के इस तरफ आकर्षित होने के पीछे कई बड़े कारण हैं:-
पैसों की बचत (Financial Freedom): बड़े शहरों में अकेले फ्लैट का किराया, बिजली का बिल, वाई-फाई और खाने का खर्च उठाना जेब पर भारी पड़ता है. को-लिविंग में दो लोग मिलकर जब ये खर्चे बांटते हैं, तो लग्जरी लाइफस्टाइल भी बजट में आ जाती है.
अकेलेपन से छुटकारा (No More Loneliness): घर-परिवार से दूर दूसरे शहरों में अकेले रहने वाले युवाओं के लिए अकेलापन एक बड़ी समस्या है. ऐसे में को-लिविंग उन्हें एक इमोशनल सपोर्ट और साथी देता है.
कोई रोक-टोक नहीं (Complete Freedom): माता-पिता या समाज की बंदिशों से दूर, युवा इस कल्चर को अपनी मर्जी से जीने की आजादी के रूप में देखते हैं.
इस बढ़ती मांग को देखते हुए अब शहरों में स्पेशल को-लिविंग हॉस्टल्स और पीजी (PG) की बाढ़ आ गई है, जहाँ युवाओं को उनकी पसंद और प्राइवेसी के हिसाब से सुविधाएं दी जा रही हैं.
चमक-धमक के पीछे छिपे खतरे भी कम नहीं-
भले ही यह ट्रेंड पहली नजर में बहुत कूल और आसान लगता हो, लेकिन इसके पीछे के जमीनी हालात और सिक्के का दूसरा पहलू काफी चिंताजनक है. मानसिक रोग विशेषज्ञों (Psychologists) और काउंसलर्स के पास आजकल ऐसे युवाओं के कई मामले आ रहे हैं, जो इस शॉर्ट-टर्म रिश्ते के चक्कर में अपनी मानसिक शांति खो बैठते हैं:
ब्रेकअप और धोखा खाने का डर: चूंकि इस रिश्ते में कोई सामाजिक या कानूनी जिम्मेदारी नहीं होती, इसलिए छोटी-मोटी अनबन होने पर भी लोग आसानी से रिश्ता तोड़ लेते हैं. कई बार युवा (विशेषकर लड़कियां) भावनात्मक रूप से गंभीर हो जाती हैं, जबकि पार्टनर सिर्फ शारीरिक आकर्षण या अस्थायी जरूरत के लिए साथ होता है, जिससे बाद में भारी मानसिक आघात पहुंचता है.
जिम्मेदारियों से भागने की आदत: एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस कल्चर में रहने वाले कई युवा असल शादीशुदा जिंदगी को एक बोझ समझने लगते हैं. उन्हें लगता है कि शादी करने से उनकी आजादी छिन जाएगी और जिम्मेदारियां बढ़ जाएंगी. नतीजा यह हो रहा है कि वे स्थायी रिश्तों (Long-term commitments) से कतराने लगे हैं.
करियर और सेहत पर असर: तात्कालिक सुख और बिना सोचे-समझे लिए गए फैसलों के कारण कई बार युवाओं को अनचाहे गर्भ (Pregnancy) या अबॉर्शन जैसी स्वास्थ्य संबंधी और मानसिक समस्याओं से गुजरना पड़ता है, जिसका सीधा असर उनके करियर पर भी दिखता है.
तमाम खतरों को जानते हुए दूसरों की अंधी नकल करने की इस होड़ में युवाओं को बहुत सतर्क रहने की जरूरत है. को-लिविंग कल्चर अगर आज के दौर की जरूरत या पसंद बन रहा है, तो युवाओं को इसके फायदों के साथ-साथ इसके इमोशनल, सोशल और मेंटल साइड-इफेक्ट्स को भी समझना होगा. किसी भी रिश्ते में आगे बढ़ने से पहले भविष्य के परिणामों पर विचार करना और खुद की सुरक्षा (Emotional & Safety) का ध्यान रखना बेहद जरूरी है.









