नई दिल्लीः साल 2020 के दिल्ली दंगों में आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या को लेकर अदालत ने ताहिर हुसैन समेत पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। फैसला सुनाते हुए अदालत ने हत्या को बेहद क्रूर और समाज को झकझोर देने वाला अपराध बताया। अदालत की टिप्पणी के अनुसार अंकित शर्मा की निर्मम हत्या की गई और हत्या के बाद उनके शव को घसीटकर नाले में फेंक दिया गया ताकि उसकी पहचान न हो सके। इन्हीं सब मामलों को लेकर ‘कॉफी पर कुरुक्षेत्र‘ कार्यक्रम में चर्चा की गई। इस दौरान कार्यक्रम में शो की एंकर पीनाज़ त्यागी के साथ गेस्ट के रूप में वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता, राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पाराशर मौजूद रहे।
अराजक तत्वों को हिम्मत कहां से आती है
चर्चा के दौरान सवाल उठाया गया कि आखिर ऐसे अराजक तत्वों को इतनी हिम्मत कहां से मिलती है कि वे पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को भी चुनौती देने से नहीं डरते। यह भी कहा गया कि दोषी ठहराए जाने और उम्रकैद की सजा मिलने के बाद भी ताहिर हुसैन द्वारा अदालत के फैसले को “मैच फिक्स” बताना न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने की कोशिश है।
पैनल में मौजूद वक्ताओं ने कहा कि किसी भी अपराधी को राजनीतिक या सामाजिक संरक्षण मिलने का संदेश समाज के लिए खतरनाक होता है। उनका कहना था कि जब अपराधियों को यह भरोसा हो जाए कि कोई न कोई उनके बचाव में खड़ा हो जाएगा, तब कानून का डर कमजोर पड़ने लगता है। चर्चा में यह भी कहा गया कि राजनीतिक दलों को अपराध और कानून-व्यवस्था के मामलों में वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देनी चाहिए।
बहस के दौरान छात्र आंदोलनों का भी जिक्र
बहस के दौरान हाल के छात्र आंदोलनों का भी जिक्र हुआ। वक्ताओं ने माना कि छात्रों की वास्तविक समस्याओं और मांगों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए, लेकिन उनकी आड़ में अराजक तत्वों को हिंसा फैलाने या कानून अपने हाथ में लेने की छूट नहीं मिलनी चाहिए। उनका कहना था कि सरकार और छात्रों के बीच बातचीत के बाद आंदोलन समाप्त होना इस बात का संकेत है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर समाधान संभव है।
चर्चा में यह भी कहा गया कि पुलिस और सुरक्षा बलों पर लगातार सवाल उठाने से उनके मनोबल पर असर पड़ सकता है। पुलिसकर्मियों के परिवारों की चिंता का भी जिक्र किया गया और कहा गया कि ड्यूटी के दौरान घायल होने या जान गंवाने वाले जवानों के पीछे उनके परिवार भी होते हैं। इसलिए कानून तोड़ने वालों के खिलाफ निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई होना जरूरी है।
लोकतंत्र में विरोध और सवाल उठाना नागरिक का अधिकार
अंत में वक्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध और सवाल उठाना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन विरोध का स्वरूप हिंसक या भीड़तंत्र में नहीं बदलना चाहिए। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपनी आवाज लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से उठाएं तथा किसी भी अराजक तत्व या उकसावे का हिस्सा बनने से बचें। उनका कहना था कि कानून का सम्मान, न्याय व्यवस्था में विश्वास और राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखना ही ऐसे मामलों से सही सबक होगा।
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(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)









