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Right Way To Check Compatibility: रणबीर कपूर ने एक इंटरव्यू में बताया कि वो और आलिया शादी से पहले लिव-इन में रहे. इसमें कोई दोराय नहीं कि आज के समय में कपल्स के बीच लिव-इन में रहना कंपैटिबिलिटी चेक करने का एक पैमाना बन गया है. लेकिन क्या ये सही तरीका है, चलिए समझते हैं.
बॉलीवुड के ‘रॉकस्टार’ रणबीर कपूर ने कजिन करीना कपूर के वॉट वूमन वान्ट शॉ में बताया था कि वो और आलिया भट्ट शादी से पहले लिव इन रिलेशनशिप में थे. ये बात उन्होंने उस सवाल के जवाब में कही थी जब उनसे करीना ने ये पूछा था कि वो शादी और लिव इन में से क्या चुनेंगे. रणबीर ने ये भी कहा था कि उन्हें लगता है कि लिव इन रिलेशनशिप में कुछ भी गलत नहीं है. मैं और आलिया शादी से पहले लिव-इन रिलेशनशिप में थे, और बहुत ही नेचुरली ये रिश्ता शादी की ओर बढ़ गया.
इसमें कोई दोराय नहीं कि आज के समय में लिव-इन रिलेशनशिप का ट्रेंड बहुत ही तेजी से बढ़ रहा है. कपल्स शादी करने से पहले ये सुनिश्चित कर लेना चाहते हैं, कि वो साथ रह सकते हैं. लेकिन कंपैटिबिलिटी चेक करने का क्या ये सही तरीका है? ये सवाल अक्सर उठता है, कि जब दो लोग प्रेम में होने के बावजूद और लिव-इन की अग्नि परीक्षा पास करने के बाद भी शादी में घूंटने लगते हैं.
क्या है कंपैटिबिलिटी?
कम्पैटिबिलिटी का मतलब है दो लोगों की सोच, जीवनशैली और मूल्यों का एक-दूसरे से मेल खाना.
उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति एक ही रिश्ते में विश्वास रखता है, तो उसका तालमेल ऐसे व्यक्ति के साथ मुश्किल हो सकता है जो एक से अधिक रिश्तों को सही मानता हो. यही कम्पैटिबिलिटी कहलाती है. किसी भी रिश्ते का लंबे समय तक सफल रहना इस बात पर निर्भर करता है कि दोनों लोगों के बीच कितनी अच्छी कम्पैटिबिलिटी है.
लिव-इन रिलेशनशिप के फायदे और नुकसान
लिव-इन रिलेशनशिप में ज्यादातर लोग ये टेस्ट करने के लिए आते हैं, कि शादी के बाद वो साथ रहने के लिए कंपैटिबल हैं या नहीं. लेकिन वास्तव में इससे बहुत कम ही रिश्ते सवर पाते हैं. क्योंकि इसके फायदे और नुकसान दोनों हैं. लिव-इन रिलेशनशिप में दो लोग शादी के बिना साथ रहते हैं. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि दोनों एक-दूसरे को अच्छे से समझ पाते हैं. इससे रिश्ते में भरोसा और समझ बढ़ती है. साथ ही जिम्मेदारियों और खर्चों को भी बांटना आसान हो जाता है.
लेकिन इसके कुछ नुकसान भी हैं. समाज में आज भी कई लोग इसे स्वीकार नहीं करते, जिससे आलोचना का सामना करना पड़ सकता है. कई बार रिश्ते में स्थिरता की कमी होती है और अलग होने पर भावनात्मक परेशानी बढ़ सकती है. इसलिए लिव-इन रिलेशनशिप का फैसला सोच-समझकर और आपसी समझ के साथ लेना चाहिए. इसके अलावा कुछ लोग सिर्फ फीजिकल बेनिफिट्स के लिए लिव-इन रिलेशनशिप में आते हैं, जबिक साथ वाला पार्टनर लॉन्ग टाइम कमिटमेंट चाहता है. ऐसे में मेंटल ट्रॉमा का रिस्क बढ़ जाता है, जो फ्यूचर रिलेशनशिप को बर्बाद कर सकता है.
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शारदा सिंह मध्यप्रदेश की रहने वाली हैं. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना सफर शुरू किया. उनके पास डिजिटल मीडिया और लाइफस्टाइल पत्रक…
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