“महिलाएं झट से पहचान लेती हैं…”- प्रियंका गांधी के इस बयान में कितनी सच्‍चाई! क्‍या सच में महिलाएं भांप लेती हैं पुरुषों की नीयत

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Female Intuition Psychology : संसद सत्र के दौरान प्रियंका गांधी वाड्रा का एक बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने कहा कि “कोई भी महिला बता देगी कि बार-बार बहकाने वाले पुरुषों को महिलाएं झट से पहचान लेती हैं.” राजनीति से इतर, यह बयान एक गहरे मनोवैज्ञानिक सच की ओर इशारा करता है जिसे दुनिया भर के एक्सपर्ट्स ‘फीमेल इंस्टिंक्ट’ (Female Instinct) या महिलाओं की ‘छठी इंद्री’ कहते हैं. सोशल मीडिया पर जहां प्रियंका के इस बयान को ‘विमेंस पावर’ से जोड़कर देखा जा रहा है, वहीं मनोविज्ञान (Psychology) के पास इस दावे को लेकर बहुत ही दिलचस्प जवाब हैं. तो क्या वाकई महिलाओं के पास ऐसी ‘छठी इंद्री’ होती है?

1. इवोल्यूशनरी सर्वाइवल (Survival Instinct)
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि महिलाओं में दूसरों की नीयत भांपने की क्षमता सदियों में विकसित हुई है. महिलाओं की जिम्मेदारी बच्चों की सुरक्षा और सामाजिक सामंजस्य बनाए रखने की रही है. इसके लिए उन्हें खतरों को पहले ही भांपना पड़ता था. इसे ‘इवोल्यूशनरी सर्वाइवल मैकेनिज्म’ कहा जाता है. यही कारण है कि वे किसी व्यक्ति के व्यवहार में आने वाले मामूली नकारात्मक बदलाव को भी जल्दी महसूस कर लेती हैं.

शोध के अनुसार, महिलाएं केवल आंखों को देखकर सामने वाले की मानसिक स्थिति और नीयत समझ सकती हैं.
2. माइक्रो-एक्सप्रेशंस को पढ़ने की कला
डॉ. पॉल एकमैन, जो माइक्रो-एक्सप्रेशंस के दुनिया के सबसे बड़े एक्सपर्ट माने जाते हैं, उनकी रिसर्च बताती है कि महिलाएं इन संकेतों को पढ़ने में अधिक सटीक होती हैं.

जब कोई व्यक्ति झूठ बोलता है या ‘मैनिपुलेट’ (बहकाने) की कोशिश करता है, तो उसके चेहरे पर एक सेकंड के हजारवें हिस्से के लिए कुछ भाव आते हैं, जिन्हें ‘माइक्रो-एक्सप्रेशंस’ कहते हैं.

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के शोध के अनुसार, महिलाएं केवल आंखों को देखकर सामने वाले की मानसिक स्थिति और नीयत समझ सकती हैं.

महिलाएं पुरुषों की तुलना में चेहरे के भावों, आंखों के संकेतों और आवाज के लहजे को समझने में अधिक कुशल होती हैं. वे शब्दों के पीछे छिपे असली इरादों को बेहतर तरीके से डिकोड कर सकती हैं.

3. ऑक्सीटोसिन और सोशल इंटेलिजेंस
साइकोलॉजी टुडे
के अनुसार, महिलाओं के शरीर में अक्सर ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) हार्मोन का स्तर अधिक होता है, जिसे ‘बॉन्डिंग हार्मोन’ भी कहा जाता है. यह हार्मोन उन्हें दूसरों के साथ सहानुभूति रखने और सामाजिक संकेतों (Social Cues) को बारीकी से समझने में मदद करता है. यही वह कारण है जिसे हम बोलचाल की भाषा में ‘फीमेल इंस्टिंक्ट’ या ‘अंतर्ज्ञान’ कहते हैं.

इस तरह कह सकते हैं कि पार्लियामेंट में प्रियंका गांधी का यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के उस जेनेटिक और साइकोलॉजिकल ग्रोथ का प्रतिबिंब है, जिसने उन्हें ‘सोशल इंटेलिजेंस’ में आगे बनाया है.



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