भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि एक अटूट विश्वास और समर्पण की नींव पर टिका ढांचा है. एक पत्नी अपना घर, अपना नाम और अपनी पूरी दुनिया छोड़कर जिस रिश्ते को सींचती है, उसकी सबसे बड़ी पूंजी ‘वफादारी’ होती है.
लेकिन, कानून(Supreme Court Judgment on Extra-Marital Affairs) की बदलती धाराओं ने आज इस बुनियाद पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद, अब एक शादीशुदा पुरुष का किसी दूसरी महिला के साथ रहना ‘अपराध’ (Crime) की श्रेणी में नहीं आता.
कानून की नजर में यह दो वयस्कों की ‘निजी पसंद’ हो सकती है, लेकिन उन लाखों समर्पित पत्नियों का क्या, जिन्होंने अपने जीवन का हर क्षण परिवार की खुशहाली के नाम कर दिया?
सवाल खड़ा होता है कि क्या कानून ने अनजाने में वफादारी की कीमत शून्य कर दी है? जब घर की चारदीवारी के बाहर पनपने वाले रिश्तों को कानूनी ‘सुरक्षा कवच’ मिल जाता है, तो उस पत्नी के आत्मसम्मान और उसके संघर्ष का क्या मूल्य रह जाता है जो दिन-रात घर और बच्चों को संभालने में खप जाती है?
अदालत ने भले ही दकियानूसी जंजीरें तोड़कर व्यक्तिगत आजादी के द्वार खोल दिए हों, लेकिन क्या हमारा सामाजिक ढांचा इस नए ‘बोझ’ को सहने के लिए तैयार है? क्या यह फैसला रिश्तों में ‘धोखे’ को एक मौन स्वीकृति नहीं दे रहा?
क्यों है बेमेल कानून और समाज की नजर
जब हम इस विषय की गहराई में जाते हैं, तो सबसे पहले उस कानूनी आधार को समझना जरूरी है जिसने इस पूरी बहस को जन्म दिया है. भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 497 (Adultery) दशकों तक एक शादीशुदा पुरुष और महिला के बीच के बाहरी संबंधों को अपराध मानती थी. लेकिन साल 2018 में ‘जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने इस 158 साल पुराने कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया.
तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने फैसला सुनाते हुए कहा था, “पति अपनी पत्नी का मालिक (Master) नहीं है.” कोर्ट का मानना था कि एडल्ट्री (व्यभिचार) को अपराध मानना महिला की गरिमा और उसकी व्यक्तिगत पसंद के खिलाफ है. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर वयस्क को अपनी मर्जी से जीने और संबंध बनाने का अधिकार है. इसी आधार पर, अब यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी दूसरी महिला के साथ ‘लिव-इन’ या सहमति से संबंध में रहता है, तो उसे जेल नहीं भेजा जा सकता.
समर्पित पत्नियों के आत्मसम्मान का क्या?
कानून की यह ‘आजादी’ उन महिलाओं के लिए एक बड़ा झटका बनकर उभरी है, जो अपनी पूरी जिंदगी घर-परिवार और बच्चों के पालन-पोषण में खपा देती हैं. एक समर्पित पत्नी के लिए, पति का किसी और के साथ रहना केवल एक ‘निजी पसंद’ नहीं, बल्कि उस भरोसे का कत्ल है जिस पर शादी की बुनियाद टिकी होती है.
- वफादारी का मूल्य: जब समाज और कानून ‘धोखे’ को सजा के दायरे से बाहर कर देते हैं, तो एक घरेलू महिला खुद को असुरक्षित और उपेक्षित महसूस करने लगती है.
मानसिक प्रताड़ना: भले ही यह ‘क्राइम’ नहीं है, लेकिन पति का किसी दूसरी औरत के साथ रहना पत्नी के लिए असहनीय मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) है, जिसका असर पूरे परिवार के ढांचे पर पड़ता है.
महिलाओं के लिए क्या है कानूनी कवच
हालांकि यहाँ यह समझना भी जरूरी है कि ‘अपराध नहीं होने’ का मतलब ‘पूरी छूट’ नहीं है. कानून ने आज भी पत्नियों के पास कुछ अधिकार सुरक्षित रखे हैं वे इस प्रकार हैं:
- तलाक का आधार: हिंदू मैरिज एक्ट और अन्य पर्सनल लॉ के तहत, पति का किसी और के साथ संबंध होना ‘तलाक’ लेने का एक ठोस आधार है.
- भरण-पोषण (Maintenance): घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत, पत्नी कोर्ट से गुजारा भत्ता और रहने के लिए घर की मांग कर सकती है.
- द्विविवाह (Bigamy) अभी भी जुर्म है: ध्यान रहे, बिना तलाक लिए दूसरी ‘शादी’ करना आज भी IPC की धारा 494 के तहत दंडनीय अपराध है. कानून सिर्फ ‘साथ रहने’ को अपराध नहीं मानता.
फिर भी उठते हैं कई सवाल
अंत में सवाल वही खड़ा होता है कि क्या कानून ने जंजीरें खोलकर रिश्तों को ज्यादा पारदर्शी बनाया है या फिर परिवारों के बिखरने का रास्ता साफ कर दिया है?









