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Science behind falling in love: कहते हैं प्यार अंधा होता है, पर सच तो ये है कि प्यार पूरी तरह से ‘वैज्ञानिक’ (Scientific) होता है. जब हमें किसी से प्यार होता है, तो हमें लगता है कि बस दिल के तार बज रहे हैं, लेकिन असली खेल तो हमारे दिमाग के अंदर चल रहा होता है. विज्ञान की भाषा में कहें तो प्यार में पड़ना महज एक अहसास नहीं, बल्कि शरीर के भीतर होने वाली एक ‘केमिकल लोचा’ वाली प्रक्रिया है.
जब आप किसी की तरफ खिंचे चले जाते हैं, तो आपका दिमाग कुछ खास हार्मोन्स की फैक्ट्री बन जाता है. ये हार्मोन्स आपके बर्ताव को रातों-रात बदल देते हैं. आइए जानते हैं वो 5 वैज्ञानिक बदलाव, जो बताते हैं कि आप प्यार की गिरफ्त में हैं:
दिमाग में ‘हैप्पी हार्मोन’ का ब्लास्ट- डॉ. हेलन फिशर, जो एक प्रसिद्ध बायोलॉजिकल एंथ्रोपोलॉजिस्ट हैं, ने प्यार में पड़े लोगों के दिमाग का fMRI (Functional MRI) स्कैन करके यह साबित किया था कि प्यार में पड़ने पर दिमाग का ‘रिवॉर्ड सिस्टम’ (Ventral Tegmental Area) सक्रिय हो जाता है. यह वही हिस्सा है जो डोपामाइन (Dopamine) रिलीज करता है. इसे ‘फील गुड’ हार्मोन भी कहते हैं. मजे की बात ये है कि वैज्ञानिकों के अनुसार, प्यार में डोपामाइन का असर बिल्कुल वैसा ही होता है जैसा किसी नशे या ड्रग्स का होता है. यही वजह है कि आप हर समय बस उसी इंसान के साथ रहने के बहाने ढूंढते हैं क्योंकि आपका दिमाग उस ‘हाई’ को बार-बार महसूस करना चाहता है.
धड़कनों का बेकाबू होना और पसीने छूटना- क्या कभी ऐसा हुआ है कि उसे देखते ही आपके हाथ ठंडे पड़ गए हों या दिल जोर-जोर से धड़कने लगा हो? ये सब एड्रेनालाईन (Adrenaline) नाम के हार्मोन का कमाल है.
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विज्ञान कहता है कि यह वही हार्मोन है जो हमें खतरे के समय अलर्ट करता है. प्यार में यही हार्मोन आपको एक अलग तरह की उत्तेजना और ‘बटरफ्लाई इन स्टमक’ (पेट में गुदगुदी) वाला अहसास देता है. यही नहीं, स्टैनफोर्ड के न्यूरोलॉजिस्ट्स ने इस पर शोध किया है कि कैसे प्यार में पड़ने पर शरीर का ‘नेचुरल पेनकिलर’ सिस्टम सक्रिय हो जाता है, जिससे शारीरिक दर्द कम महसूस होता है.
भूख-प्यास और नींद का उड़ जाना- यह सिर्फ कहने वाली बात नहीं है, बल्कि प्यार में पड़ने पर शरीर में कोर्टिसोल (Cortisol) लेवल बढ़ जाता है, जिससे हल्का तनाव महसूस होता है और नींद कम आती है.
वहीं, सेरोटोनिन (Serotonin) का लेवल गिर जाता है. जब सेरोटोनिन कम होता है, तो इंसान का दिमाग एक ही चीज पर फिक्स हो जाता है—यानी आपका पार्टनर! इसी वजह से न भूख लगती है और न ही सोने का मन करता है.
‘हग हार्मोन’ और बढ़ता हुआ लगाव- जब रिश्ता थोड़ा आगे बढ़ता है, तो ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) नाम का केमिकल रिलीज होता है. इसे ‘कडल हार्मोन’ या ‘लगाव का रसायन’ भी कहते हैं. यह आपको न केवल अपने पार्टनर के करीब लाता है, बल्कि आपको दूसरों के प्रति भी दयालु और केयरिंग बना देता है. यही वो हार्मोन है जो दो लोगों के बीच लंबे समय तक टिकने वाला भरोसा पैदा करता है.
एक ही इंसान की धुन सवार होना- वैज्ञानिकों के अनुसार, प्यार के शुरुआती दौर में इंसान के दिमाग में ‘सेरोटोनिन’ का स्तर उतना ही कम हो जाता है जितना OCD (Obsessive Compulsive Disorder) के मरीजों में होता है. यही कारण है कि इंसान हर वक्त सिर्फ अपने पार्टनर के बारे में ही सोचता रहता है. दिमाग का वह हिस्सा जो यादों और दोहराव के लिए जिम्मेदार है, इतना एक्टिव हो जाता है कि आप चाहकर भी उनका ख्याल दिमाग से निकाल नहीं पाते.
तो अगली बार जब आपको लगे कि आप अजीब बर्ताव कर रहे हैं, तो समझ जाइए कि आपका शरीर आपको संकेत दे रहा है. प्यार का ये वैज्ञानिक आधार समझना इसलिए जरूरी है ताकि आप अपनी भावनाओं को बेहतर तरीके से मैनेज कर सकें. दरअसल, प्यार सिर्फ जज्बात नहीं, बल्कि कुदरत का एक बेहतरीन बैलेंस भी है जिसमें सब कुछ सही और जायज लगता है. (All Image Credit: Canva)
March 18, 2026, 15:12 IST








