Gen Z और Gen अल्फा हैं सबसे ईमानदार, मैं आंख मूंद कर यकीन करता हूं: मोहन भागवत

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Highlights

  • हमें संविधान का पालन करना चाहिए: संघ प्रमुख
  • “भारत की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत है”
  • “Gen Z और Gen Alpha को लॉजिकल जवाब चाहिए”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में आयोजित I.I.M.U.N. कार्यक्रम में Gen Z और Gen Alpha के युवाओं से संवाद कर रहे हैं। कार्यक्रम में देश के 100 से अधिक शहरों से आए 15 से 19 वर्ष आयु वर्ग के करीब 2,000 हाई स्कूल विद्यार्थी शामिल हैं। कार्यक्रम में बातचीत के दौरान पूछा गया कि भारत सरकार को क्या पहले बात कर लेनी चाहिए थी? इस पर उन्होंने कहा कि Gen z से बात कर लेनी चाहिए थी। आंदोलन भी संवाद का तरीका है। अगर नहीं सुना जा रहा है, तो आंदोलन तक जा सकते हैं।

“Gen Z और Gen Alpha को लॉजिकल जवाब चाहिए”

उन्होंने कहा कि Gen z का असंतोष जेन्युइन है। भारत की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। Gen Z और Gen Alpha को लॉजिकल जवाब चाहिए। पहले जमाने वाली बात नहीं कि जो बड़े लोग कहेंगे, वो मान लेना चाहिए। Gen z को आंदोलन नहीं करना चाहिए, ऐसा बिल्कुल नहीं है। जब वो कुछ बोल रहे हैं, तो हमें सुनना चाहिए। पिछले Gen z प्रोटेस्ट के दौरान बातचीत में कमी तो रही है। हमारी अगली पीढ़ी है। हमारे अपने हैं। उन्हें एंटी नेशनल कैसे कह सकते हैं? सबसे ऑनेस्ट जनरेशन Gen z और Gen Alpha अल्फा है। लाठीचार्ज क्यों हुआ, कैसे हुआ इसके बारे में ना मुझे पूरी जानकारी है, ना आपको। लेकिन मैं आंख मूंद कर Gen z पर यकीन करता हूं।

हर व्यक्ति का अपना-अपना दृष्टिकोण होता है: संघ प्रमुख

मोहन भागवत ने कहा कि हमारे यहां ‘शास्त्र’ की परंपरा है। इसमें केवल वाद और प्रतिवाद नहीं होता, बल्कि पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष की परंपरा होती है। हम हर पहलू को देखते हैं और हर व्यक्ति का अपना-अपना दृष्टिकोण होता है। इसी से नए आयाम सामने आते हैं। जब अनेक मत, यहां तक कि एक-दूसरे के विपरीत मत भी सामने आते हैं, तभी किसी विषय का समग्र दृष्टिकोण बनता है। इसलिए मैं यह नहीं कहूंगा कि लोगों को आंदोलन नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र में आंदोलन कैसे करना है, क्या करना है, इसके भी तरीके बताए गए हैं। हमें संविधान का पालन करना चाहिए। संविधान के निर्माता डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के भाषणों को पढ़ें, तो उसमें भी इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात कैसे रखनी चाहिए।

वे हमारे अपने, हमारी अगली पीढ़ी हैं: मोहन भागवत

साथ ही, उन्होंने कहा कि हमें यह भी समझना चाहिए कि यदि दिल्ली के लोग आवाज उठा रहे हैं, तो वे केवल विरोध के लिए नहीं उठा रहे हैं। निश्चित रूप से कोई तकलीफ या चिंता है, जिसकी वजह से वे अपनी बात कह रहे हैं। असल में वे कोई अलग लोग नहीं हैं, वे हमारे अपने हैं, हमारी अगली पीढ़ी हैं, इसलिए उनके साथ अपनापन और संवाद का रिश्ता होना चाहिए। मैंने पहले भी कहा है कि संबंधों में अपनापन और विश्वास होना जरूरी है। जब ऐसा रिश्ता बनता है, तभी वास्तविक संवाद होता है। तब उनकी बात हमें समझ में आती है और हमारी बात उन्हें समझ में आती है, इसलिए संवाद होना चाहिए। मैं बिल्कुल नहीं मानता कि Gen z के बारे में किसी तरह की नकारात्मक धारणा बना लेनी चाहिए। बिना किसी संदर्भ के भी जब-जब मुझसे इस विषय पर पूछा गया, तब भी मैंने यही कहा है, और आज भी आपके सामने दोहरा रहा हूं कि मुझे लगता है कि यह नई पीढ़ी Gen z हमारी वर्तमान पीढ़ी की तुलना में अधिक ईमानदार हैं। इसके साथ, संघ प्रमुख ने कहा कि शिक्षा के लिए 6 प्रतिशत बजट का मैं समर्थन करता हूं।

सोशल मीडिया पर बैन लगना चाहिए क्या?

इस पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहाॉ, “आपके प्रश्न का उत्तर भी इसी में है। नियम बनाना और अनुशासन स्थापित करना आवश्यक है, लेकिन वे तभी सफल होते हैं, जब लोगों का दृष्टिकोण और व्यवहार बदलता है। कानून तो बहुत बनाए गए हैं, लेकिन उनका प्रभाव तभी होता है, जब समाज उन्हें स्वीकार करता है और उनका पालन करता है।” रोल मॉडल को लेकर उन्होंने कहा कि समय के साथ रोल मॉडल भी बदलते हैं और उन्हें अपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि सोशल मीडिया पर उसके काम का अनुसरण लाखों लोग करते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके व्यवहार और संदेश का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने का कि आज तकनीक इतनी उन्नत हो गई है कि किसी की तस्वीर, आवाज और चेहरे का इस्तेमाल करके फर्जी वीडियो (डीपफेक) तैयार किए जा सकते हैं। ऐसे में सोशल मीडिया का उपयोग करते समय हर जानकारी पर तुरंत विश्वास नहीं करना चाहिए। किसी भी सूचना या वीडियो को सही मानने से पहले उसे विश्वसनीय और प्रमाणिक स्रोतों से सत्यापित करना आवश्यक है।

समलैंगिक विवाह पर क्या बोले संघ प्रमुख?

इस पर संघ प्रमुख ने कहा कि LGBTQIA+ समुदाय भी समाज का ही हिस्सा है और भारतीय समाज में उनके लिए हमेशा स्थान रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में विवाह केवल दो लोगों के साथ रहने की सुविधा नहीं, बल्कि परिवार नामक संस्था की नींव है। परिवार समाज की मूल इकाई है, जहां अगली पीढ़ी का निर्माण और संस्कार होते हैं। मोहन भागवत ने कहा कि किसी भी स्थापित व्यवस्था में बदलाव करने से पहले समाज को तैयार करना जरूरी है। कानून समाज को नहीं चलाते, बल्कि समाज की स्वीकृति के आधार पर कानून बनते हैं। ऐसे में मौजूदा विवाह व्यवस्था में जल्दबाजी में बदलाव करने से अन्य सामाजिक प्रभाव पड़ सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समलैंगिक साथियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए और उनके साथ रहने के लिए अलग कानूनी व्यवस्था या प्रणाली पर विचार किया जा सकता है। इस विषय पर समाज में व्यापक चर्चा होनी चाहिए, ताकि सभी को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सके।

पाकिस्तान पर मोहन भागवत ने क्या कहा?

उन्होंने कहा कि संघर्ष के समय ऐसा नहीं हो सकता। जब सैन्य युद्ध चल रहा हो या आतंकवाद जैसी स्थिति हो, तब परिस्थितियां अलग होती हैं। आतंकवाद भी एक प्रकार का संघर्ष है। यह आतंकवाद केवल कट्टरपंथी समूहों की हिंसा तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक विचारधारा और सुनियोजित नीति भी काम करती है- हजार घाव देकर कमजोर करने का।

बेरोजगारी पर बोले- हमें मानसिकता बदलनी होगी

इस पर संघ प्रमुख ने कहा कि सबसे पहले हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी। रोजगार का अर्थ केवल नौकरी नहीं है। रोजगार में उद्यमिता  और कौशल-आधारित कार्य भी शामिल हैं। दुर्भाग्य से आज हमारे समाज में हाथ से काम करने वाले व्यक्ति को वह सम्मान नहीं मिलता, जिसका वह अधिकारी है। उदाहरण के लिए, यदि मेरे पास चार लाख रुपये नकद हों और किसी किसान के पास चार लाख रुपये का गेहूं या चावल हो, तो दोनों जब किसी कार्यालय में जाएं, तो समाज मुझे अधिक सम्मान देता है, क्योंकि मेरे पास नकद है। जबकि वास्तविकता यह है कि मेरे पैसे से पेट नहीं भरता, लेकिन किसान के अनाज से हमारा पेट भरता है। इसके बावजूद, किसान को उतनी प्रतिष्ठा नहीं मिलती। यही ‘श्रम की प्रतिष्ठा’ का प्रश्न है और इसे हमें फिर से स्थापित करना होगा। आज समाज की सोच ऐसी हो गई है कि हर कोई किसी न किसी नौकरी के पीछे भागता है यदि संभव हो तो सरकारी नौकरी, वह भी अपने ही जिले में और घर के पास। परिणाम यह होता है कि सभी लोग एक ही अवसर के पीछे दौड़ते हैं, जबकि कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां काम तो है, लेकिन काम करने वाले लोग नहीं मिलते।

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