डॉलर कमाने वाली औलाद और सहारे के लिए मोहताज मां-बाप! इमोशनल नहीं, ऐसे करें प्रैक्टिकल रिटायरमेंट प्लानिंग!

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भारत में अक्सर यह माना जाता है कि अगर बेटा या बेटी विदेश में अच्छी नौकरी कर रहे हैं, तो माता-पिता की जिंदगी सुरक्षित है. “मेरा बेटा अमेरिका में डॉलर कमाता है” सुनकर गर्व जरूर होता है, लेकिन बढ़ती उम्र में सिर्फ पैसे नहीं, साथ भी चाहिए होता है. हाल ही में गाजियाबाद की एक घटना ने इस कड़वी सच्चाई को सामने ला दिया. लंदन में बसे बच्चों के माता-पिता में से एक बुजुर्ग की अपने फ्लैट में मौत हो गई और तीन दिन तक किसी को इसकी खबर नहीं लगी. बदबू आने पर पड़ोसियों ने पुलिस को सूचना दी, तब पता चला कि उनका निधन कई दिन पहले हो चुका था.

आज के दौर में यह किसी एक परिवार की कहानी नहीं है. भारत के मेट्रो शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक, ऐसे हज़ारों बुजुर्ग माता-पिता हैं जिनकी औलाद विदेशों में डॉलर, पाउंड या यूरो कमा रही है, लेकिन वे खुद अपनों के सहारे के लिए तरस रहे हैं.

विदेश में रहने वाले बच्चे आपकी सबसे बड़ी ताकत हो सकते हैं, लेकिन पूरी रिटायरमेंट उनकी उपलब्धता के भरोसे नहीं बनानी चाहिए.(Canva)

ऐसे में अगर आप भी 35 से 50 वर्ष की उम्र के बीच हैं और सोचते हैं कि बच्चे का शानदार करियर ही आपका ‘रिटायरमेंट प्लान’ है, तो अब संभल जाने का वक्त आ गया है. आइए जानते हैं कि इमोशनल होकर नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल होकर अपने बुढ़ापे को कैसे सुरक्षित बनाएं.

ऐसे करें अपना रिटायरमेंट प्‍लान, नहीं पड़ेगी सहारे की जरूरत-

1. बच्चों को ‘रिटायरमेंट फंड’ मानना बंद करें
भारतीय समाज में माता-पिता अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई बच्चों की पढ़ाई और उन्हें विदेश भेजने में लगा देते हैं. सोच यह होती है कि बुढ़ापे में बच्चा सहारा बनेगा. लेकिन प्रैक्टिकल कड़वा सच यह है कि बच्चों की अपनी ज़िंदगी, करियर का तनाव और अपनी जिम्मेदारियां होती हैं. इसलिए पहला नियम यही है कि बच्चे आपका भविष्य हैं, लेकिन आपका रिटायरमेंट फंड नहीं.

2. मेडिकल इंश्योरेंस सबसे पहली और बड़ी ढाल
ढलती उम्र में सबसे बड़ा खर्चा बीमारियों का होता है. बच्चा भले ही डॉलर में पैसे भेज दे, लेकिन भारत में इमरजेंसी के वक्त तुरंत कैश और कैशलेस इलाज की जरूरत होती है. इसलिए अपने लिए एक मजबूत इंडिविजुअल हेल्थ इंश्योरेंस (Super Top-up के साथ) जरूर रखें. मेडिकल इमरजेंसी फंड के तौर पर 5 से 10 लाख रुपये ऐसे लिक्विड फंड या फिक्स्ड डिपॉजिट में रखें जिन्हें तुरंत निकाला जा सके.

3. पेंशन और रेगुलर इनकम का मजबूत सोर्स बनाएं
जब तक आप कमा रहे हैं, अपनी एसआईपी (SIP), एनपीएस (NPS) और म्यूचुअल फंड्स में रिटायरमेंट कॉर्पस (Corpus) तैयार करें. रिटायरमेंट के करीब पहुंचते ही अपने पैसे को SWP (Systematic Withdrawal Plan) या वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (SCSS) जैसे विकल्पों में शिफ्ट करें, ताकि हर महीने आपके खाते में एक तय रकम (जैसे सैलरी) आती रहे. जब हर महीने आपकी अपनी पेंशन या रेगुलर इनकम आएगी, तो आपको पैसों के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा.

4. लीगल और एसेट सेफ्टी (Will & Power of Attorney)
अक्सर देखा जाता है कि माता-पिता अपनी जीती-जी सारी जायदाद बच्चों के नाम कर देते हैं. अपनी संपत्ति अपने नाम रखें और उसकी ‘वसीयत’ (Will) जरूर बनाकर रखें. किसी विश्वसनीय व्यक्ति या बैंक के माध्यम से अपनी ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ और मेडिकल फैसले लेने का अधिकार स्पष्ट रखें, ताकि आपके अकेले होने पर भी कानूनी या वित्तीय काम न रुकें.

5. ‘अकेलेपन’ से निपटने का अभी से करें उपाय
पैसे के अलावा बुढ़ापे की सबसे बड़ी बीमारी ‘अकेलापन’ है. बच्चे विदेश में सेटल हैं, तो उनका भारत लौटना व्यावहारिक रूप से हमेशा संभव नहीं होता. अपनी कम्युनिटी, वॉकिंग क्लब्स, एनजीओ या सीनियर सिटीजन ग्रुप्स से जुड़ें. भरोसेमंद लोगों का नेटवर्क बनाएं. इसमें पड़ोसी, रिश्तेदार, फैमिली डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट, वकील और एक विश्वसनीय घरेलू सहायक शामिल हो सकते हैं. जरूरत पड़ने पर यही लोग सबसे पहले काम आते हैं.

आजकल भारत के बड़े शहरों में ‘असिस्टेड लिविंग’ (Assisted Living Centers) और ‘सीनियर होम’ का ट्रेंड काफी व्यावहारिक और सम्मानजनक माना जा रहा है, जहाँ डॉक्टर, केयरटेकर और हमउम्र साथी चौबीसों घंटे मौजूद रहते हैं.

सबसे बड़ा निवेश है आत्मनिर्भरता
विदेश में रहने वाले बच्चे आपकी सबसे बड़ी ताकत हो सकते हैं, लेकिन पूरी रिटायरमेंट उनकी उपलब्धता के भरोसे नहीं बनानी चाहिए. सही निवेश, पर्याप्त मेडिकल सुरक्षा, इमरजेंसी फंड, भरोसेमंद लोकल नेटवर्क और अच्छी स्वास्थ्य आदतें मिलकर ऐसी रिटायरमेंट तैयार करती हैं, जिसमें सम्मान भी होता है और सुकून भी.

याद रखिए, सफल रिटायरमेंट का मतलब सिर्फ इतना नहीं कि आपके बच्चे डॉलर कमा रहे हैं. असली सफलता तब है, जब आप अपने फैसले खुद ले सकें, जरूरत पड़ने पर किसी के इंतजार में न रहें और बढ़ती उम्र भी आत्मविश्वास के साथ जी सकें.



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