कई बार व्यक्तित्व, पिछले अनुभव, भरोसे की कमी या अपनी पसंद भी इसकी वजह हो सकती है. आइए जानते हैं कि कुछ लोगों के पास एक भी दोस्त क्यों नहीं होता और इसके पीछे मनोवैज्ञानिक सच क्या है.
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
कैलाश दीपक हॉस्पिटल की कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट डॉ. मेघा अग्रवाल के अनुसार, कई लोग समय के साथ इतने आत्मनिर्भर बन जाते हैं कि उन्हें अपनी भावनाएं दूसरों के साथ साझा करना मुश्किल लगने लगता है. वे हर समस्या खुद ही सुलझाना पसंद करते हैं और भावनात्मक सहारे की जरूरत महसूस नहीं करना चाहते. धीरे-धीरे यह उनकी आदत और एक तरह का सुरक्षा कवच बन जाता है.
वहीं कैलाश हॉस्पिटल, देहरादून के कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट डॉ. गौरव अग्रवाल बताते हैं कि कुछ मानसिक स्वास्थ्य स्थितियां भी इसमें भूमिका निभा सकती हैं. उदाहरण के लिए, डिप्रेशन होने पर व्यक्ति का लोगों से मिलने-जुलने का मन नहीं करता, जबकि सोशल एंग्जायटी डिसऑर्डर में दूसरों के सामने जज किए जाने का डर इतना बढ़ जाता है कि व्यक्ति सामाजिक परिस्थितियों से बचने लगता है.
बचपन के अनुभव भी डालते हैं असर
डॉक्टर के अनुसार, बचपन में बने रिश्तों का तरीका भी आगे चलकर दोस्ती पर असर डालता है. कुछ लोगों को किसी के बहुत करीब आना असहज लगता है, इसलिए वे दूरी बनाए रखते हैं. वहीं कुछ लोग दोस्त बनाना तो चाहते हैं, लेकिन बार-बार रिजेक्शन का डर उन्हें रिश्ते निभाने से रोक देता है.
हर अकेलापन डिप्रेशन या मानसिक समस्या की निशानी नहीं होता. (Canva)
ओवरथिंकिंग भी बन सकती है वजह
डॉक्टर अग्रवाल बताती हैं कि कई लोग छोटी-छोटी बातों का जरूरत से ज्यादा विश्लेषण करते हैं. अगर किसी दोस्त ने देर से जवाब दिया या बातचीत में बदलाव आया, तो वे तुरंत मान लेते हैं कि सामने वाला उन्हें पसंद नहीं करता. यही ओवरथिंकिंग उन्हें धीरे-धीरे लोगों से दूर कर देती है और वे खुद को सामाजिक गतिविधियों से अलग करने लगते हैं.
कब लेनी चाहिए मदद?
विशेषज्ञों का कहना है कि हर अकेलापन चिंता की बात नहीं है. कुछ लोग स्वभाव से अंतर्मुखी होते हैं और अकेले समय बिताकर खुश रहते हैं. उन्हें कम लेकिन सार्थक रिश्ते पसंद होते हैं. हालांकि अगर दोस्त न होने के साथ लगातार उदासी, घबराहट, अकेलापन, निराशा या लोगों से पूरी तरह कट जाने की भावना भी बनी रहे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ऐसी स्थिति में किसी मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से सलाह लेना बेहतर होता है.
इसलिए यह बात ध्यान में रखना होगा कि दोस्तों की संख्या किसी व्यक्ति की खुशी या मानसिक स्वास्थ्य का पैमाना नहीं होती. कुछ लोग अकेले रहकर भी पूरी तरह संतुष्ट और मानसिक रूप से स्वस्थ होते हैं. इसलिए किसी के पास दोस्त न होने का मतलब यह नहीं कि वह मानसिक बीमारी से जूझ रहा है.
जरूरी यह है कि व्यक्ति अपनी जिंदगी से संतुष्ट हो और भावनात्मक रूप से स्वस्थ महसूस करे. अगर अकेलापन तकलीफ देने लगे, तभी उसे गंभीरता से लेकर विशेषज्ञ की मदद लेना सही कदम होगा.









