5 Bold Books By Female Authors : आज सोशल मीडिया का दौर है. पर किताबें आज भी हमारे समाज का असली चेहरा है. समाज का अंतरंग सार इसी किताबों में बाहर आती है. हर दौर में किताबों ने समाज को आईना भी दिखाया है और दिशा भी दी है. लेकिन जब-जब महिला लेखिकाओं ने अपनी कलम से समाज के इस आइने से ढोंग और पाखंड का पर्दा हटाने की कोशिश की, तब-तब स्थापित मान्यताओं में भूचाल आया है. देश और दुनिया के साहित्यिक इतिहास में ऐसी कई बोल्ड किताबें दर्ज हैं, जिनमें महिलाओं की दबी हुई इच्छाओं, यौन अंतरंगता और शारीरिक आजादी को बेबाकी से उकेरा गया है. जब ये किताबें छपीं, तो इन महिला लेखकों पर समाज ने अश्लीलता के ठप्पे लगाए, अदालती मुकदमे चलाए और लेखिकाओं को बैन करने की कोशिशें कीं. लेकिन तमाम विरोधों के बावजूद यही विवादित कृतियां आगे चलकर महिलाओं के अधिकारों, उनके स्वतंत्र अस्तित्व और सोच की क्रांति का प्रतीक बनीं. ऐसे में हमने दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य की एसिस्टेंट प्रोफेसर अर्चना रानी से महिला लेखकों द्वारा लिखी गई ऐसी 5 बोल्ड किताबों के बारे में जानने की कोशिश की है. अर्चना रानी ने इसी कड़ी में 5 वेवाक और लीक तोड़ने वाली क्रांतिकारी किताबों के बारे में विस्तार से बात की है.
लिहाफ-इस्मत चुगताई
इस्मत चुगताई साहित्यिक जगत में बेवाक लेखिका में रूप में चर्चित रही हैं और करीबियों में इस्मत आपा के नाम से मशहूर रही हैं. 1942 में इस्मत आपा ने लिहाफ नाम से उर्दू साहित्य की सबसे बोल्ड किताबें लिखी थीं. ये किताबें सैकड़ों भाषाओं में अनुदित हुईं. आज के डिजिटल युग में इसे कहीं से भी पढ़ा जा सकता है. लिहाफ के प्रकाशित होने के बाद तत्कालीन समाज में भूचाल आ गया था. लिहाफ में इस्मत चुगताई ने समाज के उस दुखती रग वाले पहलू पर रोशनी डाली थी, जिस पर तब बात करना भी सख्त टैबू माना जाता था. इसमें औरतों के समलैंगिक संबंधों को बेपर्दा किया गया था जिसमें एक औरत की दबी हुई यौन इच्छाएं उजागर हुई थी. इस कहानी को एक नन्हीं बच्ची की नजर से बयान किया गया था. यह नन्ही बच्ची यह सारा वाकया देखती है जो अपनी बेगम जान के घर रूकी है. बेगम जान का पति नवाब समलैंगिक है और अपनी पत्नी की उपेक्षा करता है. बेगम जान के अकेलेपन और शारीरिक-मानसिक कुंठा को मिटाने के लिए उनकी नौकरानी रब्बो उनकी मालिश करती है. कहानी में लिहाफ एक मेटाफर है. रात के अंधेरे में हिलते-डुलते लिहाफ की परछाइयों के जरिए बेगम जान और रब्बो के शारीरिक संबंधों की ओर इशारा किया गया है. इस्मत चुगताई की यह कहानी बेहद छोटी है लेकिन इसकी तीव्रता इतनी अधिक थी कि इसे आज भी महसूस किया जा रहा है.
विवाद क्यों
जब यह कहानी साहित्यिक पत्रिका अदब-ए-लतीफ में प्रकाशित हुआ था तो आते ही हर तरफ हंगामा बरप गया. रूढ़िवादी समाज, धार्मिक कट्टरपंथियों और यहां तक कि कुछ साहित्यिक आलोचकों ने भी इसे अश्लील, गंदी और इस्लाम-विरोधी करार दिया. ब्रिटिश सरकार ने इस कहानी पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज किया और इस्मत चुगताई को लाहौर की अदालत में समन भेजा. अदालत में जज ने इस्मत से पूछा कि क्या कहानी में इस्तेमाल शब्द अश्लील हैं? तब बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि पूरी कहानी में एक भी ऐसा शब्द नहीं है जिसे गंदा या अश्लील कहा जा सके. दरअसल, इस पूरी कहानी में इस्मत ने एक भी जगह नग्न या अश्लील शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन प्रतीकों से सब कुछ साफ कर दिया था. जब अभियोजन पक्ष को एक भी ऐसा शब्द नहीं मिला तो अदालत ने इस्मत चुगताई को बरी कर दिया. इस्मत चुगताई ने कोर्ट में साफ कहा था, “मैंने जो देखा, वही लिखा. अगर समाज को यह गंदा लगता है, तो समाज को अपने अंदर झांकना चाहिए.
द्विखंडित-तस्लीमा नसरीन
बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने अमार मायबेला नाम से तीन सीरीज में अपनी आत्मकथा लिखी है. यह मूल रूप से बांग्ला में है जिसे हिन्दी में लज्जा और द्विखंडित नाम से प्रकाशित किया गया है. द्विखंडित इसका तीसरा भाग है. द्विखंडित मतलब दो टुकड़ों में बंटा हुआ. यह किताब तस्लीमा के जीवन के उस दौर की कहानी है जब वे डॉक्टर बनने के बाद साहित्य की दुनिया में कदम रख रही थीं और अपनी व्यक्तिगत, सामाजिक व बौद्धिक पहचान के लिए संघर्ष कर रही थीं. इस किताब में तस्लीमा नसरीन ने पुरुष-प्रधान समाज, धर्म के ठेकेदारों और भद्रलोक के ढोंग पर निडर प्रहार किया है. इसी बेबाकी के कारण यह पुस्तक भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे विवादित और चर्चित ग्रंथों में गिनी जाती है. इस किताब में तस्लीमा नसरीन ने अपनी जिंदगी में पुरुष रिश्तेदारों, दोस्तों यहां तक कि नामचीन साहित्यकारों के साथ अपने यौन संबंधों और उसके अनुभवों को बिना किसी हिचकिचाहट के साथ उजागर किया है. इसमें साहित्यिक जगत के दोगलेपन पर भी हमला किया गया है. उन्होंने दिखाया कि जो पुरुष बाहर से बहुत प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष और नारीवादी होने का नाटक करते हैं, वे बंद कमरों में औरतों के प्रति कितने पितृसत्तात्मक, शोषक और स्वार्थी होते हैं. औरत की अपनी यौन इच्छाओं को दबा दिया जाता है और धर्म व परंपरा के नाम पर उनकी कुंठाओं को अनदेखा किया जाता है. किताब में उन्होंने इस्लाम, धार्मिक मान्यताओं, शरीयत और महिलाओं पर थोपी जाने वाली बंदिशों पर कड़े सवाल उठाए और स्वतंत्रता तथा स्त्री-देह पर महिला के अपने अधिकार की वकालत की.
विवाद क्यों
विवाद तो छोड़िए, इस किताब को लिखने के बाद तस्लीमा नसरीन पर मौत का फतवा जारी किया गया. उनके सिर पर इनाम रखा और उन्हें काफिर घोषित कर दिया. पहली ही किताब लज्जा लिखने के बाद तस्लीमा को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा. कई नामचीन लेखकों और बुद्धिजीवियों के नाम सीधे तौर पर शामिल होने के कारण इस पर काफी हंगामा हुआ. प्रसिद्ध कवि और साहित्यकार सैयद मुस्तफा सिराज ने तस्लीमा पर 11 करोड़ रुपये का मानहानि का केस दर्ज कराया. तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य की वामपंथी सरकार ने इस किताब को बैन कर दी. 2005 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के इस बैन को असंवैधानिक ठहराते हुए खारिज कर दिया और किताब की बिक्री से रोक हटा ली.
मित्रो मरजानी-कृष्णा सोबती
मित्रो मरजानी प्रसिद्ध साहित्यकार कृष्णा सोबती की सबसे विवादित कृति है. यह लघु उपन्यास हिन्दी साहित्य के इतिहास में मील का पत्थर वाली अत्यंत क्रांतिकारी किताब है. 1967 में जब मित्रो मरजानी प्रकाशित हुई तो पूरे हिंदी साहित्य जगत में एक बड़ा तूफान खड़ा हो गया. कृष्णा सोबती ने इस उपन्यास में एक ऐसी नायिका ‘मित्रो’ (सुमित्रा) को गढ़ा जो अपनी देह, अपनी शारीरिक इच्छाओं और यौन संतुष्टि के बारे में बिना किसी झिझक के खुलकर बोलती है. यह मध्यम वर्गीय संयुक्त परिवार की कहानी है. इसमें मित्रो का पति सरदारारी उसकी शारीरिक जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ है. इस कारण मित्रो अपनी यौन तृप्ति न होने पर सीधे अपने पति, सास और जेठानी, देवरानी के सामने बेबाक अपनी बात रखती है. जहां पारंपरिक महिला इस बात को अपनी सीने में दबाकर ताउम्र रख लेती हैं वहीं मित्रो कोई चीज छुपाकर रखने वाली औरत नहीं है. वह अपने रूप-रंग और अपनी देह की भूख को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करती है. वह साफ कहती है कि उसकी देह को संतुष्टि चाहिए और इसके लिए वह किसी से डरती नहीं है. यह किताब केवल विचारों से नहीं बल्कि अपनी भाषा और संवादों के मामले में उस दौर के हिसाब से बेहद आक्रामक और बोल्ड थी. कहानी का अंत बेहद नाजुक मोड़ पर होता है. यौन उत्कंठा को जागृत करने के बावजूद मित्रो मरजानी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल कामुकता की कहानी नहीं है, बल्कि स्त्री के आत्म-सम्मान और नैतिक चरित्र की कहानी भी है. उपन्यास के अंत में जब मित्रो की मां जो वेश्यावृत्ति में थी, उसे अपने साथ ले जाकर एक धनी पुरुष के साथ नया जीवन बसाने और अपनी देह की भूख मिटाने का प्रस्ताव देती है लेकिन मित्रो उसे साफ ठुकरा देती है. वह कहती है कि वह अपनी इच्छाओं के लिए मुखर जरूर है, लेकिन वह अपने पति का घर छोड़कर या कुल की मर्यादा बेचकर अपनी तृप्ति नहीं करेगी. मित्रो मरजानी ने यह साबित किया कि अपनी देह की इच्छाओं को स्वीकार करना और चरित्रहीन होना दो अलग बातें हैं. कृष्णा सोबती की यह रचना हिंदी साहित्य की पहली ऐसी कृति बनी जिसने स्त्री देह की स्वतंत्रता और उसकी भाषा को साहित्य के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया.
विवाद क्यों
मित्रो मरजानी में पंजाबी-हिंदी की ठेठ और अनगढ़ भाषा का इस्तेमाल किया गया था. इसमें देह के अंगों, काम वासना और बोलचाल की गालियों व उक्तियों का बेबाक प्रयोग था.आलोचकों और तत्कालीन समाज के लिए एक महिला लेखक के कलम से ऐसी बिंदास भाषा सुनना बहुत बड़ा सदमा था. उस समाज में पति की यौन अक्षमता को उजागर नहीं किया जाता था और औरत को चुपचाप सहना होता था. लेकिन मित्रो अपने पति को उसकी शारीरिक अक्षमता के लिए सीधे लताड़ती है. यह पुरुष-सत्तात्मक समाज के अहंकार पर सीधा वार था. आलोचकों ने इसे अश्लील, उच्छृंखल और भारतीय संस्कृति को भ्रष्ट करने वाला उपन्यास करार दिया. यहां तक कि कुछ प्रकाशक भी शुरुआत में इसे छापने से कतरा रहे थे क्योंकि इसमें औरत की यौन कुंठा को बिना किसी पर्दे या लज्जा के दिखाया गया था.
चाक-मैत्रेय पुष्पा
चाक नारीवादी लेखिका मैत्रेयी पुष्पा का क्रांतिकारी उपन्यास है. यह उपन्यास हिंदी साहित्य में ग्रामीण पृष्ठभूमि, जातिगत राजनीति और स्त्री-देह की स्वायत्तता का एक बेहद प्रखर और यथार्थवादी दस्तावेज है. यह केवल यौनिकता के अर्थ में बोल्ड नहीं है, बल्कि ग्रामीण समाज में स्थापित पुरुष-सत्तात्मक ढांचे और सामंती दमन को सीधे चुनौती देने के कारण अत्यंत क्रांतिकारी और विवादास्पद रहा है. यह कहानी है ब्रज क्षेत्र के एक गांव अटार की है जिसमें नायिका सारंग है. जाति और वर्ग में बंटे इस गांव में सारंग की शादी नपुंसक और शारीरिक, मानसिक रूप से अक्षम श्रीधर मास्टर जी से होती है. गांव का दबंग रंजीत सारंग पर डोरे डालता है लेकिन सारंग उसे दुत्कार देती है और गांव में एक युवक रेशम की और प्रेमातुर आकर्षित होती है. सारंग अपनी शारीरिक तृप्ति और भावनात्मक जुड़ाव के लिए रेशम के साथ अपनी मर्जी से संबंध बनाती है. जब सारंग गर्भवती होती है, तो पूरे गांव में भूचाल आ जाता है. अनंत दुश्वारियां सहने के बावजूद सारंग गांव में ही अपने बच्चे को जन्म देती है पूरी शोषक व्यवस्था से सीधा लोहा लेती है. सारंग जब रेशम से संबंध बनाती है तो उसके भीतर पारंपरिक कुलटा या अपराध बोध का भाव नहीं होता. वह इसे अपनी देह और मन की स्वाभाविक और वैध जरूरत मानती है. ‘चाक’ में मैत्रेयी पुष्पा ने स्त्री देह को किसी पुरुष की संपत्ति या घर की इज्जत मानने की मानसिकता पर गहरा प्रहार किया है. चाक का बोल्डनेस केवल बिस्तर के कमरों तक सीमित नहीं है, यह सत्ता, जाति और पति के एकाधिकार के खिलाफ एक ग्रामीण औरत की बेबाक बगावत है.
विवाद क्यों
जब चाक प्रकाशित हुआ, तो हिंदी साहित्य और सामाजिक गलियारों में इस पर तीखी बहसें हुईं. आलोचकों के एक वर्ग का तर्क था कि ग्रामीण भारत की महिलाएं इतनी उच्छृंखल या बिंदास नहीं होतीं. मैत्रेयी पुष्पा पर आरोप लगाया गया कि वे गांव की संस्कृति को भ्रष्ट और अश्लील रूप में दिखा रही हैं. एक शादीशुदा महिला का अपने असमर्थ पति को किनारे कर दूसरे पुरुष से संबंध बनाना और उसे सरेआम स्वीकारना तत्कालीन पारंपरिक पाठकों के लिए पचाना बहुत मुश्किल था. उपन्यास में सामंती ज़मींदारों द्वारा दलित और कमजोर वर्ग की औरतों के साथ किए जाने वाले यौन शोषण का इतना नग्न और कड़वा सच लिखा गया था कि स्थानीय सत्ता और जातिवादी समूहों को यह बेहद नागवार गुजरा है.
शर्मिष्ठा-अनु शक्ति सिंह
पेशे से पत्रकार अनु शक्ति सिंह द्वारा लिखित शर्मिष्ठा आधुनिक समय में भी विवादों के केंद्र में आ गई है. यह उपन्यास महाभारत कथा की पात्र शर्मिष्ठा के जीवन पर आधारित है. लेकिन अनु शक्ति सिंह ने इसे पारंपरिक ढर्रे पर लिखने के बजाय एक स्त्री के देह, उसकी इच्छाओं, स्वाभिमान और उसके अधिकारों के आधुनिक संदर्भों के साथ जोड़ा है. इसमें स्त्री की कामुकता, उसकी शारीरिक जरूरतों और उसके स्वतंत्र निर्णयों को बहुत बेबाक और बोल्ड तरीके से उभारा गया है. शर्मिष्ठा, दानवराज वृषपर्वा की स्वाभिमानी पुत्री है. जल क्रीड़ा के दौरान गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से वस्त्रों का हेर-फेर हो जाती है. अहंकार के आवेग में शर्मिष्ठा देवयानी को कुएं में धकेल देती है. शुक्राचार्य राज्य छोड़ने की धमकी देते हैं. अपनी प्रजा और पिता के राज्य की रक्षा के लिए शर्मिष्ठा को अंततः देवयानी की दासिका बनना स्वीकार करना पड़ता है. का विवाह हस्तिनापुर के चंद्रवंशी राजा ययाति से होता है. शर्मिष्ठा को राज महल में दासी बनना पड़ता है. लेकिन राजभवन के एक कोने में एकाकी और उपेक्षित जीवन जीते हुए भी शर्मिष्ठा अपने स्वाभिमान और देह-चेतना को मरने नहीं देती. ययाति उसके रूप और दृढ़ व्यक्तित्व की ओर आकर्षित होते हैं. शर्मिष्ठा किसी याचना या अधीनता के भाव से नहीं बल्कि अपने अस्तित्व, प्रेम और काम-इच्छा पर अपने पूर्ण अधिकार के साथ ययाति से गुप्त रूप से संबंध बनाती है जिससे पुरु सहित कई पुत्रों का जन्म होता है. रहस्य उदघाटित होने पर देवयानी से ययाति को वृद्धावस्था का श्राप मिलता है. लेखिका ने इस आख्यान को केवल इतिहास या पौराणिक कथा नहीं रहने दिया है. यह कहानी दर्शाती है कि कैसे एक राजकन्या से दासी बनी स्त्री, महल के षड्यंत्रों, पुरुषों की वासना और समाज के ताना-बाना के बीच अपनी देह, अपनी यौनिकता और अपने निर्णयों की स्वामिनी स्वयं बनती है. अंततः उसका पुत्र पुरु ही ययाति का साम्राज्य संभालता है जो शर्मिष्ठा के मौन किंतु दृढ़ प्रतिशोध और स्वाभिमान की अंतिम विजय सिद्ध होता है.
विवाद क्यों
एक शादीशुदा राजा ययाति और उसकी दासी शर्मिष्ठा के बीच के शारीरिक संबंधों को शर्मिष्ठा की सहमति और आनंद के रूप में दिखाना समाज के एक वर्ग को नागवार गुजरा है. इसे अनैतिक और अश्लील कहा जाने लगा है. इसे आलोचकों के एक वर्ग ने छल, घर तोड़ने वाली मानसिकता और उच्छृंखलता कहा, जबकि लेखिका ने इसे एक स्त्री के आत्मसम्मान और प्रतिशोध का नाम दिया. धार्मिक कथा की इस तरह की बेबाक चीर-फाड़ को कई लोगों ने सांस्कृतिक मूल्यों पर हमला माना है. एक राजकन्या से दासी बनी औरत अपनी देह, अपने गर्भ और अपने जीवन के फैसले खुद लेती है और राजा को भी अपने इशारों पर झुका देती है. यही निर्भीकता इस किताब को हिंदी साहित्य की सबसे बोल्ड और विवादास्पद किताबों में शामिल करती है.









