पापा ‘आई लव यू’ क्यों नहीं कह पाते? समझें उनके इस बर्ताव के पीछे की साइकोलॉजी, तो क्या है उनका लव लैंग्वेज

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How Do Fathers Show Love Through Actions: “मम्मी तो दिन में दस बार प्यार जता देती हैं, लेकिन पापा कभी खुलकर अपनी भावनाएं क्यों नहीं बताते?” यह एक ऐसा सवाल है जो लगभग हर संतान के मन में कभी न कभी जरूर आता है. कई घरों में पापा का मतलब सिर्फ अनुशासन, डांट या गंभीर स्वभाव ही मान लिया जाता है. लेकिन मनोविज्ञान (Psychology) कहता है कि पिताओं का यह मौन उनकी बेरुखी नहीं है. असल में, उनका प्यार शब्दों का मोहताज नहीं होता, बल्कि उनके काम करने के अंदाज में छिपा होता है.

क्यों ‘एक्शन’ को ही अपना ‘प्यार’ मान लेते हैं पिता?
मनोविज्ञान में कहा गया है कि हर इंसान की ‘लव लैंग्वेज’ (प्यार जताने का तरीका) अलग होती है. जहां मां अक्सर बोलकर या गले लगाकर प्यार जताती हैं, वहीं ज्यादातर पिता ‘एक्ट ऑफ सर्विस’ यानी काम और जिम्मेदारियों के जरिए अपना प्यार दिखाते हैं. आपके लिए देर रात तक जागकर ऑफिस का काम करना, आपकी स्कूल-कॉलेज की फीस का इंतजाम सबसे पहले करना, या हर तरह की जरूरतों को पूरा करना- यही उनका ‘आई लव यू’ कहने का अंदाज होता है. वे शब्दों के भूखे नहीं होते, बल्कि उनका पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि उनका परिवार सुरक्षित और खुश रहे.

परवरिश का असर
हमारे समाज में पिताओं को हमेशा ‘घर की रीढ़’ यानी एक मजबूत और सख्त इंसान के रूप में पेश किया जाता है. साइकोलॉजी कहती है कि बचपन में उन्होंने अपने पिता को भी ऐसा ही देखा था, इसलिए वे अनजाने में उसी व्यवहार को दोहराते हैं. उनके लिए जिम्मेदारी उठाना, अनुशासन बनाए रखना और बच्चों को जीवन की कठिनाइयों के लिए तैयार करना ही एक अच्छे पिता की मुख्य परिभाषा बन जाती है.

जहां मां अक्सर बोलकर या गले लगाकर प्यार जताती हैं, वहीं ज्यादातर पिता ‘एक्ट ऑफ सर्विस’ यानी काम और जिम्मेदारियों के जरिए अपना प्यार दिखाते हैं.

ये है ‘अटैचमेंट थ्योरी’
मशहूर मनोवैज्ञानिक जॉन बॉल्बी की ‘अटैचमेंट थ्योरी’ (Attachment Theory) के अनुसार, माता-पिता का मुख्य काम बच्चों को एक सुरक्षित माहौल देना है ताकि वे बिना किसी डर के बढ़ सकें. पिता इस थ्योरी को बहुत गंभीरता से जीते हैं. वे खुद तकलीफ झेल लेंगे, पुराने कपड़े पहन लेंगे, लेकिन आपकी हर जरूरत को वक्त से पहले पूरा करेंगे.

मनोविज्ञान कहता है कि पिता जब बच्चों की जरूरतों को अपनी खुशियों से आगे रखते हैं, तो वे शब्दों के बिना ही एक ऐसा मजबूत सुरक्षा कवच बना रहे होते हैं जो बच्चों को जिंदगी में आगे बढ़ने का हौसला देता है.

अगली पीढ़ी को मजबूत बनाने की चाहत
मनोवैज्ञानिक एरिक एरिकसन ने इंसानी जीवन के एक खास पड़ाव को ‘जेनेरेटिविटी’ (Generativity) कहा है. इसका मतलब है कि उम्र के एक हिस्से में आकर इंसान अपनी खुशियों से ज्यादा अगली पीढ़ी के भविष्य को संवारने में लग जाता है. पिता आपकी हर छोटी-बड़ी कामयाबी को अपनी सफलता मानते हैं.

जब वे आपको लाइफ स्किल्स सिखाते हैं, पैसों का सही इस्तेमाल करना बताते हैं या करियर के कड़े फैसले लेने में आपका मार्गदर्शन करते हैं, तो वह उनका सबसे गहरा प्यार ही होता है. वे आपको सिर्फ आज के लिए लाड़-प्यार नहीं देना चाहते, बल्कि आपको कल के लिए आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं.

मौन और दूरी के बीच का फर्क समझना है जरूरी
अक्सर बच्चे पिता की इस खामोशी को ‘बेरुखी’ या ‘कठोरता’ समझ लेते हैं, जिससे रिश्तों में एक अनजानी दूरी आ जाती है. लेकिन साइकोलॉजी साफ़ करती है कि भावनाओं को ज़ाहिर न कर पाने (Emotional Restraint) का मतलब यह कतई नहीं है कि अंदर भावनाएं मौजूद ही नहीं हैं (Emotional Absence).

एक पिता के दिल में भी अपने बच्चों के लिए उतना ही गहरा समंदर होता है, बस उनके पास उस समंदर को शब्दों के जरिए बाहर लाने का हुनर या अभ्यास नहीं होता. जब हम इस मनोवैज्ञानिक सच को स्वीकार कर लेते हैं, तो पिता के प्रति हमारा नजरिया पूरी तरह बदल जाता है.



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