नई दिल्ली: यूको बैंक को फर्जी दस्तावेजों के दम पर 7 करोड़ की चपत लगाने वाले 25 साल पुराने मामले में दिल्ली की विशेष अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत के द्वारा एक टेक्सटाइल कंपनी के 3 पूर्व डायरेक्टर्स को धोखाधड़ी का दोषी पाया गया है। हालांकि, इस पूरे मामले में यूको बैंक के जिस पूर्व अधिकारी को आरोपी बनाया गया था उसे सबूतों के अभाव में अदालत ने बरी कर दिया है।
किन लोगों को दोषी ठहराया गया?
विशेष न्यायाधीश सुधांशु कौशिक ने द्वारकाधीश स्पिनर्स लिमिटेड (DSL) के पूर्व निदेशक अमित चतुर्वेदी, संजय चतुर्वेदी और परवीन जुनेजा को आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेजों को असली बताकर इस्तेमाल करने का दोषी पाया। वहीं, यूको बैंक के पूर्व अधिकारी बिकाश बसु को अदालत के द्वारा बरी कर दिया गया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि बसु किसी साजिश में शामिल थे या उन्होंने कोई अवैध लाभ लिया अथवा आपराधिक मंशा से काम किया।
जानिए क्या था पूरा मामला
यह मामला सीबीआई (CBI) की वर्ष 2009 में दर्ज एफआईआर पर आधारित है। जांच एजेंसी के अनुसार, आरोपियों ने वर्ष 2001 में यूको बैंक की पार्लियामेंट स्ट्रीट शाखा से 7 करोड़ रुपये का लोन हासिल करने के लिए साजिश रची थी।शुरुआत में कंपनी ने बैंक को बताया था कि यह रकम इंडस्ट्रियल फाइनेंशियल कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (IFCI) के पुराने कर्ज का अग्रिम भुगतान (Prepayment) करने के लिए चाहिए। लोन मंजूर होने के बाद कंपनी के निदेशकों ने बैंक को बताया कि IFCI ने प्रीपेमेंट स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। इसके बाद उन्होंने बैंक को यह कहकर लोन का उद्देश्य बदलने के लिए राजी किया कि अब यह राशि सरकार की टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन फंड स्कीम (TUFS) के तहत नई मशीनें खरीदने के लिए इस्तेमाल की जाएगी।
फर्जी CA सर्टिफिकेट और नकली बिल का इस्तेमाल
सीबीआई के अनुसार, आरोपियों ने लोन की रकम जारी कराने के लिए एक फर्जी चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) का प्रमाणपत्र और एक फर्जी कंपनी का नकली बिल (Invoice) बैंक में जमा किया। इन दस्तावेजों के जरिए यह दिखाया गया कि कंपनी ने नई मशीनें खरीद ली हैं और उन्हें स्थापित भी कर दिया है। हालांकि जब जांच की गई तो पता चला कि कोई भी मशीन नहीं खरीदी गई थी। वहीं लोन की रकम को कंपनी से जुड़ी अन्य कंपनियों में भेज दिया गया था।
अदालत ने क्या कहा?
29 जुलाई को सुनाए गए 160 पन्नों के फैसले में अदालत ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियां साफ दिखाती हैं कि शुरुआत से ही आरोपियों की मंशा बैंक को धोखा देने की थी और सभी ने मिलकर लोन की रकम को दूसरी जगह भेजने की योजना बनाई। अदालत ने कहा, “यह साबित करने के लिए पर्याप्त और मजबूत सबूत हैं कि आरोपियों ने बैंक को धोखा दिया और लोन की राशि का दुरुपयोग किया।” अदालत ने यह भी कहा कि सभी आरोपी इस बात से पूरी तरह वाकिफ थे कि लोन कैसे लिया जाएगा, रकम कैसे जारी होगी और उसे दूसरी जगह कैसे भेजा जाएगा।
समझौता करने से खत्म नहीं होगी आपराधिक जिम्मेदारी
बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी थी कि कंपनी ने बैंक के साथ वन-टाइम सेटलमेंट (OTS) कर लिया था, इसलिए मामला खत्म माना जाना चाहिए। लेकिन अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि यह सिर्फ लोन नहीं चुकाने का सामान्य मामला नहीं है, बल्कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बैंक को धोखा देकर पैसा हासिल करने और जानबूझकर उसका दुरुपयोग करने का मामला है। अदालत ने स्पष्ट कहा, “बैंक के साथ समझौता कर लेने से आरोपियों की आपराधिक जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।” अदालत ने यह भी कहा कि लोन की राशि का जानबूझकर और धोखाधड़ी के इरादे से दुरुपयोग करना केवल दीवानी (सिविल) नहीं, बल्कि आपराधिक अपराध भी है। आरोपियों ने उस उद्देश्य के लिए पैसा इस्तेमाल नहीं किया, जिसके लिए बैंक ने लोन दिया था। इससे बैंक को बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ।
बैंक अधिकारी क्यों हुए बरी?
अदालत ने यूको बैंक के पूर्व अधिकारी बिकाश बसु को बरी करते हुए कहा कि केवल उन्हें ही बैंक की प्रक्रियागत कमियों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि बसु की सिफारिश की समीक्षा उनसे वरिष्ठ दो अन्य अधिकारियों ने भी की थी। ऐसे में उनके खिलाफ आपराधिक साजिश या भ्रष्टाचार का कोई पुख्ता सबूत अदालत को नहीं मिला।
अब सजा पर होगी सुनवाई
अदालत ने तीनों दोषियों को अपराधी करार दे दिया है। अब अगली सुनवाई में उनके लिए सजा की अवधि और अन्य दंड तय किए जाएंगे।
(इनपुट- पीटीआई)
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