संसद का मॉनसून सत्र खत्म हो गया। सत्र का 80 पर्सेंट वक्त विपक्ष के हंगामे की वजह से बर्बाद हुआ। जनता की गाढ़ी कमाई के 142 करोड़ रुपये पानी में चले गए। सरकार को अपना कामकाज निपटाना था, वह तो हो गया, लेकिन विधेयकों पर चर्चा नहीं हो पाई। दोनों सदनों की कार्यवाही 114 घंटे चलनी थी, लेकिन लोकसभा में 96 घंटे से ज्यादा का वक्त हंगामे में बर्बाद हो गया। राज्यसभा में 77 घंटे हंगामा होता रहा। विपक्ष की वजह से मॉनसून सत्र वॉशआउट हो गया। पिछले बीस दिन में विरोध के नाम पर जिस तरह की हरकतें की गई, वो भी शर्मनाक हैं। अंतिम दिन कांग्रेस के सांसद मदारी बन गए, monkey soft toys लेकर संसद पहुंचे, मोदी के खिलाफ उसी तरह की नारेबाजी की, जैसी जंतर मंतर पर हुई थी।
अगर विपक्ष के नेताओं को लगता है कि 19 दिन तक लोकसभा की कार्यवाही रोक कर उन्होंने किला फतह कर लिया, तो ये उनकी गलतफहमी है। संसद की कार्यवाही ठीक से चले, इसमें विपक्ष का ज्यादा फायदा होता है। सरकार से कड़वे सवाल पूछे जा सकते हैं। मंत्रियों को corner किया जा सकता है। जो बिल सरकार लाती है, उनकी कमियों को विपक्ष उजागर कर सकता है। सोचिए कि सरकार का क्या गया? जो बिल पास कराने थे, वो बिना बहस के पास करा लिए। 12 बिल पास हुए और मंत्रियों को असुविधाजनक सवालों के जवाब नहीं देने पड़े। विपक्ष के सांसदों का भी भारी नुकसान हुआ।
संसद में प्रश्नकाल के दौरान सांसद अपने चुनाव क्षेत्र से जुड़े सवाल उठाते हैं, थोड़ा दबाव बना कर मंत्रियों से काम करवा लेते हैं। सत्ता पक्ष के सांसद तो अपने चुनाव क्षेत्र के काम वैसे भी करवा सकते हैं क्योंकि जितने भी मंत्री हैं वो उन्हीं की पार्टियों के हैं। लेकिन अब विरोधी दल के सांसद अपने क्षेत्र में जाकर अपनी जनता को क्या जवाब देंगे? इस बात को हर विपक्षी सांसद व्यक्तिगत रूप से काफी महसूस करते हैं। अगर विपक्ष के नेताओं को लगता है कि उन्होंने ये दिखा दिया कि अमित शाह जवाब देने से भाग रहे हैं, तो ये दांव भी फेल हो गया क्योंकि सत्र खत्म होने से पहले अमित शाह ने चुनौती दे कर इस दावे की हवा निकाल दी। सदन में हंगामा करके, कार्यवाही रोक कर, विपक्ष ने अपना बहुत नुकसान किया। न माया मिली, न राम।
क्या राहुल की हताशा अब कड़वाहट में बदल चुकी है?
राहुल गांधी संसद में गतिरोध को अपनी जीत बताते हैं। राहुल ने कहा कि उन्होंने मोदी और अमित शाह की नाक में दम कर दिया है, अब जब तक मोदी इस्तीफा नहीं दे देते, अमित शाह की कुर्सी नहीं चली जाती, तब तक मोदी और शाह को चैन से सोने नहीं देंगे। कांग्रेस के एक कार्यक्रम में राहुल ने भद्दे तरीके से प्रधानमंत्री मोदी का मज़ाक उड़ाया। राहुल ने कहा कि मोदी जहां भी जाते हैं विदेशी नेताओं के गले पड़ जाते हैं। राहुल ने लोगों के सामने ये करके भी दिखाया। कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित को मंच पर गले लगा लिया। राहुल गांधी जब प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाते हैं तो आश्चर्य नहीं होता। वह पिछले 12 साल से मोदी को कभी ‘चोर’, कभी ‘कायर’, कभी ‘कांपने वाला’ कहते रहे हैं। अब उनकी लिस्ट में अमित शाह भी शामिल हो गए हैं।
राहुल गांधी जानते हैं कि देश में मोदी और अमित शाह का aura (छवि) है। वो ये भी मानते हैं कि उनकी अपनी पार्टी के नेता भी इन दोनों से डरते हैं। राहुल को यकीन है कि जब तक मोदी और शाह की ऐसी छवि सलामत है, वो इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। इन नेताओं के लिए तू-तड़ाक की भाषा का इस्तेमाल करना, ‘पागल कर दूंगा’ जैसे dialogue मारना, इसी मंशा का नतीजा है, लेकिन मोदी की लोकप्रियता ने राहुल को तीन-तीन बार लोकसभा चुनाव में हराया है। देश के 22 राज्यों में NDA की सरकारें हैं, फिर भी हर चुनाव में राहुल कहते हैं कि, ‘लिख कर ले लो, इस बार मोदी को हराएंगे’। लेकिन हर बार उल्टा होता है।
ये हताशा अब कड़वाहट में बदल चुकी है और ये स्वाभाविक है। पर हमारे देश में गाली देने वालों को, अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने वालों को जनता पसंद नहीं करती। इसीलिए बीजेपी के नेता कहते हैं कि राहुल गांधी जितना कड़वा बोलते हैं, मोदी को उतना ही फायदा होता है। बीजेपी के कई नेताओं ने मुझे कहा है कि राहुल उनके सबसे बड़े दोस्त हैं, campaigner हैं और जब तक राहुल के पास कांग्रेस की कमान है, बीजेपी को चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।
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