मेलबर्न की सरजमीं पर रानी मुखर्जी का बजा डंका, डॉक्टरेट की उपाधि मिलते ही छलके एक्ट्रेस के आंसू

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बॉलीवुड अभिनेत्री रानी मुखर्जी ने अपने करियर में एक और स्वर्णिम अध्याय जोड़ लिया है। मेलबर्न के फेडरेशन स्क्वायर में आयोजित इंडियन फिल्म फेस्टिवल ऑफ मेलबर्न 2026 के विशेष समारोह के दौरान ऑस्ट्रेलिया के प्रतिष्ठित ला ट्रोब विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट ऑफ लेटर्स की मानद उपाधि से सम्मानित किया। इस गरिमामय क्षण के दौरान रानी बेहद भावुक नजर आईं और उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। यह सम्मान भारतीय सिनेमा में उनके लगभग तीन दशकों के अमूल्य योगदान के साथ-साथ महिलाओं, बच्चों और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए उनके निरंतर प्रयासों की पहचान है।

शाहरुख खान के बाद यह सम्मान पाने वाली दूसरी भारतीय

इस सर्वोच्च उपाधि को प्राप्त करने के साथ ही रानी मुखर्जी देश की दूसरी ऐसी फिल्म हस्ती बन गई हैं, जिन्हें ला ट्रोब विश्वविद्यालय ने इस सम्मान से नवाजा है। उनसे पहले वर्ष 2019 में बॉलीवुड के ‘किंग खान’ यानी शाहरुख खान को सिनेमा और परोपकारी कार्यों में उनके योगदान के लिए यह मानद उपाधि दी गई थी, जिसके बाद विश्वविद्यालय ने उनके नाम पर एक पीएचडी छात्रवृत्ति की शुरुआत भी की थी। रानी ने इस उपलब्धि को अपने जीवन के सबसे विनम्र और गर्व से भर देने वाले क्षणों में से एक बताया।

बचपन के सपनों से लेकर सिनेमा के मुकाम तक

समारोह के दौरान अपनी जीवन यात्रा को याद करते हुए अभिनेत्री ने कहा कि बचपन में हर बच्चे की तरह उनका सपना भी अपने माता-पिता और देश का नाम रोशन करना था। उन्हें उस समय यह रास्ता तो नहीं पता था, लेकिन इतना भरोसा जरूर था कि यदि वह किसी काम को पूरी निष्ठा से करेंगी तो उनके माता-पिता को गर्व होगा। आगे चलकर सिनेमा उनके इसी सपने को पूरा करने का मुख्य माध्यम बना। उन्होंने साझा किया कि वह शुरू से ही जोखिम उठाने वाली कलाकार रही हैं और हमेशा ऐसी कहानियों का चयन किया है, जिन्होंने पहले उनके दिल को छुआ और समाज को प्रेरित किया।

संस्कृति और सामाजिक जिम्मेदारी का माध्यम

रानी मुखर्जी का मानना है कि अभिनय केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि कलाकारों के कंधे पर अपनी संस्कृति के प्रतिनिधित्व की एक मौन जिम्मेदारी भी होती है। उनका मानना है कि फिल्में दिमाग को बदलने से पहले दिलों को बदलने की ताकत रखती हैं। अगर उनके अभिनय ने दुनिया भर में किसी एक व्यक्ति को भी भारत और यहां की महिलाओं के संघर्षों को बेहतर ढंग से समझने में मदद की है तो वह मानती हैं कि उनका कलात्मक दायित्व पूरा हुआ है।

सामाजिक बदलाव पर केंद्रित प्रभावशाली अभिनय

ला ट्रोब विश्वविद्यालय के कुलाधिपति जॉन ब्रम्बी एओ ने रानी के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि उनकी फिल्मों ने केवल मनोरंजन नहीं किया, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और समावेशिता जैसे विषयों पर सार्थक चर्चा शुरू की। रानी ने ‘ब्लैक’, ‘नो वन किल्ड जेसिका’, ‘हिचकी’, ‘मर्दानी’ सीरीज और ‘मिसेज चैटर्जी वर्सेस नॉर्वे’ जैसी फिल्मों के माध्यम से विकलांगता, महिला सशक्तिकरण और मानवाधिकारों से जुड़े गंभीर मुद्दों को बड़े पर्दे पर पूरी ईमानदारी से उठाया है।

देश और दर्शकों को समर्पित सम्मान

इस मानद उपाधि को स्वीकार करते हुए रानी मुखर्जी ने इसे पूरे भारतवर्ष और विश्वभर में फैले अपने दर्शकों को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि वह इस डॉक्टरेट को केवल रानी के रूप में नहीं, बल्कि एक गौरवान्वित भारतीय के रूप में स्वीकार कर रही हैं, जिसकी संस्कृति का सम्मान आज विदेशी धरती पर हो रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सिनेमा इसी तरह दो देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने और सांस्कृतिक दूरियों को मिटाने का काम करता रहेगा।

‘मर्दानी 3’ के साथ बड़े पर्दे पर वापसी

काम के मोर्चे पर रानी मुखर्जी को हाल ही में ‘मर्दानी 3’ में देखा गया था, जिसका निर्देशन अभिराज मीनावाला ने किया है और निर्माण आदित्य चोपड़ा (यश राज फिल्म्स) ने किया है। इस फिल्म में वह एक बार फिर जांबाज आईपीएस अधिकारी शिवानी शिवाजी रॉय के अपने चर्चित किरदार में लौटी हैं। फिल्म में उनके साथ जानकी बोडीवाला और मल्लिका प्रसाद ने भी अहम भूमिकाएं निभाई हैं। इस बार कहानी तीन महीनों में गायब हुई 93 युवा लड़कियों की जांच के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां शिवानी एक बेहद खतरनाक और संगठित मानव तस्करी नेटवर्क का पर्दाफाश करती हैं। फिल्म को लोगों ने काफी पसंद किया, क्रिटिक्स से भी अच्छा रिस्पॉन्स मिला। इस फिल्म को आप ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर देख सकते हैं।

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