सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी को महज इसलिए नौकरी से नहीं निकाला जा सकता है कि उसके विरुद्ध कोई क्रिमिनल केस चल रहा है, खासकर तब जब उस कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर न दिया गया हो। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने एक सिपाही को नौकरी से हटाने को गैरकानूनी माना, क्योंकि उसे हटाते वक्त वह दोषी नहीं ठहराया गया था और यह ऑर्डर पूरी तरह से क्रिमिनल केस पेंडिंग होने के आधार पर दिया गया था।
सिपाही को सरकारी नौकरी से हटाने पर SC की टिप्पणी
लाइल लॉ डॉट इन में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “अपीलकर्ता को जॉब से इसलिए नहीं हटाया गया कि उसको किसी आपराधिक आरोप में दोषी ठहराया जा चुका था, बल्कि महज इसलिए हटाया गया क्योंकि उसके विरुद्ध क्रिमिनल केस पेंडिंग था। उसे अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं दिया गया। हमें ऐसा कोई कानून नहीं दिखा है जो किसी सरकारी नियोक्ता को पुलिस विभाग में एक दशक से अधिक वक्त से काम कर रहे कर्मचारी को केवल क्रिमिनल केस पेंडिंग होने के आधार पर नौकरी से निकालने या हटाने का अधिकार देता हो। ऐसी में नौकरी से हटाने के इस निर्णय को सही नहीं ठहराया जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट ने 5 लाख मुआवाजा देने का दिया आदेश
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद नौकरी पर वापस रखने का ऑर्डर देने से इनकार कर दिया और संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए पंजाब सरकार को निर्देश दिया कि वह अपीलकर्ता को मुआवजे के रूप में 5 लाख रुपये का भुगतान करे।
2002 में नहीं जॉइन करने दी गई थी ड्यूटी
गौरतलब है कि अपीलकर्ता को शुरू में 1991 में पंजाब पुलिस में स्पेशल पुलिस ऑफिसर के रूप में नियुक्त किया गया था। फिर बाद में उसको पटियाला की फर्स्ट इंडियन रिजर्व बटालियन में सिपाही के पद पर नियुक्ति के लिए चुना गया था। लेकिन अगस्त, 2002 में उन्हें ड्यूटी जॉइन करने नहीं दी गई थी। इससे पहले हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जज बनने की तैयारी करने वालों को बड़ी राहत दी थी। अब जज की परीक्षा की तैयारी करने वालों को सिर्फ 1 साल वकालत का अनुभव चाहिए होगा।
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