Explainer: अमेरिका पर 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज! क्या दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था दिवालिया होने की राह पर है?

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क्या अमेरिका एक तबाह होता हुआ सुपर पॉवर है? क्या ईरान से टकराना अमेरिका को भारी पड़ गया? क्या ईरान ने अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश की नैया डुबोने का इंतज़ाम कर दिया है? क्या दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था दिवालिया होने की तरफ बढ़ रही है? क्या एक और सुपर पॉवर ने मिटने की तरफ कदम बढ़ा दिया है? अमेरिकी इतिहास में पहली बार यूएस का कर्ज़ 40 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गया है।  भारतीय रुपये में ये रकम 3800 लाख करोड़ रूपये से ज़्यादा बनती है। अगस्त की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिकी सरकार का कुल राष्ट्रीय कर्ज़ पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर के पार चला गया है। यानी करीब 40 लाख करोड़ डॉलर। लेकिन सवाल सिर्फ इतना भर नहीं है कि अमेरिका पर कितना कर्ज़ है। सवाल ये है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी रकम की कर्ज़दार क्यों हो गई है?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना गले की फांस

मध्य पूर्व का स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अमेरिका के गले की फांस बन चुका है। ईरान से जंग की वजह से अमेरिका अपने हाथ जलाए बैठा है। दुनियाभर में बढ़ रहे कच्चे तेल दाम और महंगाई का भी दबाब अमेरिका पर है। ट्रंप फ्रस्ट्रेटेड हैं, खिसियाए हुए हैं। और इसी बीच आई एक खबर ने ट्रंप प्रशासन की पोल खोल कर रख दी है। अमेरिका का कर्ज़ 40 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गया है। अमेरिका के लिए 40 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा सिर्फ एक नया रिकॉर्डभर नहीं है। ये अमेरिका की बढ़ते कर्ज़ डिपेंडेन्सी को भी दिखाता है। अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज़ 2017 के आसपास करीब 20 ट्रिलियन डॉलर था। और अब एक दशक से भी कम वक्त में ये रकम दोगुनी होकर 40 ट्रिलियन डॉलर के पार जा पहुंची है। यानी अमेरिकी सरकार ने जितना कर्ज़ जमा किया है, वो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के सालाना उत्पादन के आकार से भी बड़ा हो चुका है। अमेरिका की जीडीपी करीब 32 ट्रिलियन डॉलर है। ऐसे में कर्ज़ का  40 ट्रिलियन डॉलर को पार करने का मतलब है कि अमेरिका का सरकारी कर्ज़ जीडीपी के मुकाबले करीब 125 फीसद हो गया है। इसे आसान शब्दों में समझिए। मान लीजिए दो लोगों ने 10-10 लाख रू का कर्ज लिया है। और उनमें से A सालाना 10 लाख कमाता है जबकि दूसरा व्यक्ति B 20 लाख सालाना कमाता है तो दूसरे व्यक्ति B के लिए कर्ज़ संभालना आसान हो जाएगा।

अमेरिका इतना कर्ज़ क्यों लेता है?

अब सवाल ये है कि आखिर अमेरिका इतना कर्ज़ क्यों लेता है? इसका जवाब सिर्फ एक वजह में नहीं है। अमेरिका दशकों से अपनी कमाई से ज्यादा खर्च करता आया है। सरकार का खर्च लगातार उसकी टैक्स इनकम से ज्यादा रहा है। और इस गैप को भरने के लिए अमेरिकी सरकार Bonds और दूसरे सरकारी securities जारी करके पैसा उधार लेती है। लेकिन सरकारी खर्च और कमाई का गैप लगातार बढ़ता ही जा रहा है और ये अब तक के उच्चतम स्तर पर है। अमेरिका की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2026 में बजट डेफिसिट करीब 1.9 ट्रिलियन डॉलर रहेगा और 2036 तक बढ़कर 3.1 ट्रिलियन डॉलर हो सकता है।

अमेरिका के लिए असली खतरा क्या है?

एक बात और समझने वाली है कि अमेरिका के लिए असली खतरा कर्ज़ नहीं, बल्कि ब्याज है। अमेरिकी सरकार के लिए ब्याज का भुगतान अब सालाना 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा हो चुका है। और जैसे-जैसे पुराने कर्ज़ को ऊंचे ब्याज दरों पर refinance किया जाता है, सरकार के लिए ब्याज का बिल और बढ़ता जाता है। अमेरिका के लिए एक चिंता की बात ये भी है कि बॉन्ड मार्केट भी चेतावनी दे रहा है। इसका मतलब ये है कि निवेशक अमेरिकी सरकार को लंबे वक्त के लिए पैसा देने के बदले अब ज्यादा ब्याज मांग रहे हैं। मतलब अमेरिकी सरकार के लिए दुनिया के बाज़ार से कर्ज़ उठाना पहले के मुकाबले में महंगा होता जा रहा है।

ईरान युद्ध की वजह से पैदा हुआ संकट?

अब आते हैं सबसे अहम सवाल पर। क्या अमेरिका का ये कर्ज़ संकट ईरान युद्ध की वजह से पैदा हुआ है। इस सवाल का जवाब सीधा सा नहीं है। ईरान युद्ध की वजह से अमेरिका कर्ज़ में डूब गया है ऐसा भी नहीं है। अमेरिका का कर्ज़ ईरान युद्ध से बहुत पहले ही बढ़ता हुआ 30 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका था। COVID के दौरान भारी भरकम सरकारी खर्च। मौजूदा और पिछली सरकारों की नीतियां। टैक्स में छूट। खासतौर से बड़े कारोबारियों के tax cuts,  डिफेंस के लिए किया जा रहा है खर्च, और भी बहुत कुछ है। इन सबने मिलकर अमेरिकी कर्ज़ को बढ़ाया है। लेकिन ईरान युद्ध ने पहले से कर्ज़ में डूब रहे अमेरिका को और कर्ज़ के समंदर में डुबा दिया है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने जुलाई 2026 तक ईरान युद्ध की लागत करीब 38 अरब डॉलर बताई थी। लेकिन स्वतंत्र एजेंसीज़ इस खर्च को कहीं ज़्यादा आंकती हैं। ट्रंप प्रशासन ने हालात से निपटने के लिए अमेरिकी कांग्रेस करीब 90 अरब डॉलर की मांग की थी। लेकिन ईरान ने जिस तरह से खाड़ी देशों में अमेरिकी बेसेज़ को तबाह किया है। वहां पर तैनात साज़ो सामान जलाकर खाक कर दिया है। और उसे दोबारा फिर से उसी सूरत में खड़ा करने कीमत जोड़ दी जाए। तो ये खर्च सैंकड़ों अरब डॉलर में जाता है।

IMF ने क्या चेतावनी दी?

युद्ध का मतलब हैज्यादा military deployment, ज्यादा गोला बारूद जंगी साज़ो सामान, मिसाइल्स और एयर डिफेंस सिस्टम का खर्च, नौसेना का खर्च और खाड़ी देशों में अभियान। ऐसे में युद्ध लंबा चलता है तो defense expenditure खतरनाक स्तर तक बढ़ सकता है। IMF ने भी चेतावनी दी है।  कि युद्ध और बढ़ता है तो defense खर्च पहले से कमजोर सरकारी खज़ाने पर और दबाव डालेगा। IMF के मुताबिक global debt और fiscal pressures पहले ही बढ़ रहे हैं और मध्य पूर्व का तनाव हालात और खराब कर रहा है। इस जंग का एक और पहलू है। ईरान युद्ध का दूसरा असर तेल के रास्ते आता है। पूरी दुनिया को तेल का शॉक लगा है। अगर मध्य पूर्व से तेल सप्लाई प्रभावित रहती है। क्रूड ऑयल और महंगा होता है। तो पेट्रोल डीज़ल महंगा होगा। ट्रान्सपोर्ट महंगा हो जाएगा। प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ेगी। महंगाई और बढ़ने का खतरा सिर पर मंडरा रहा है। और अगर महंगाई बढ़ती है तो तो अमेरिकी ब्याज दरों में कटौती मुश्किल हो जाएगी। ज़्यादा ब्याज दरों का मतलब है। अमेरिकी सरकार के लिए कर्ज़ और महंगा हो जाएगा। यानी ईरान युद्ध अमेरिका को कई तरह से बर्बाद कर रह है।

क्या अमेरिका दिवालिया होने वाला है?

अब सबसे बड़ा सवाल। क्या अमेरिका दिवालिया होने वाला है? फिलहाल ऐसा कहना ठीक नहीं होगा। अमेरिका के पास दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। अमेरिका डॉलर में कर्ज़ लेता है। और दुनिया का कारोबार अब भी डॉलर में ही होता है। मतलब दुनिया के बाजारों का अमेरिकी डॉलर में भरोसा अब भी कायम है। लेकिन फिसकल ट्रैजेक्टरी चिंता पैदा ज़रूर कर रही है। अगर घाटा और कर्ज़ इसी रफ्तार से बढ़ते रहे। तो आने वाले सालों में समस्या बहुत बड़ी हो सकती है। मतलब ये कि खर्च के मुकाबले अगर कमाई नहीं होगी तो अकबर का खजाना भी खाली हो सकता है। और अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश दिवालिया हो सकता है। एक और सुपर पॉवर तबाह हो सकता है।

बता दें कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर अमेरिका और ईरान में तनातनी चल रही है। दोनों देश होर्मुज पर अपना आधिपत्य जमाना चाहते हैं। वैसे तो ईरान ने इस समुद्री रास्ते को बंद कर रखा है लेकिन पता चला है कि अमेरिका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते से कच्चा तेल काफी मात्रा में चुपके चुपके निकाल रहा है। 

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