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Son-Parent Relationship : जिस मां ने अपने गर्भ में 9 महीने रखकर उसे जन्म दिया और जिस पिता ने उंगली पकड़कर उसे चलना सिखाया, उसी बेटे ने एक ही दिन में माता-पिता को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिए. कोल्हापुर के हुपरी क्षेत्र की इस घटना ने पूरे समाज को हिलाकर रख दिया है. यह केवल अपराध की खबर नहीं है बल्कि समाज के उस सड़ते हुए ताने-बाने की त्रासदी है, जहां संपत्ति और लालच के आगे ममत्व के सारे धागे छिन्न-भिन्न हो जाते हैं. आखिर कोई औलाद उस हद तक कैसे गिर सकती है कि जन्म देने वालों का ही कत्ल कर दे? आइए, इस मानसिक विकृति, संस्कारों की कमी और उन कानूनी कदमों को समझते हैं, जो ऐसी नौबत आने से रोक सकते थे.
माता-पिता की हत्या पर उठे बड़े सवाल.
Parent-Son Relationship: कोल्हापुर में जो घटना हुई है वह मानवता को शर्मसार करती है.आपने कई ऐसे जानवरों की भी कहानी सुनी होगी जो अपने बच्चों के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर देते हैं. लेकिन लालच के आगे आज इंसान इतने विकृत हो गए हैं कि वे अपने माता-पिता को भी नहीं छोड़ता. जिन हाथों ने कभी उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिन कंधों पर बिठाकर दुनिया दिखाई, जब वही हाथ संपत्ति के कुछ टुकड़ों के लिए माता-पिता की गर्दन पर उतर आएं तो यह केवल एक अपराध नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत और रिश्तों के भरोसे की हत्या है. महाराष्ट्र के कोल्हापुर में संपत्ति अपने नाम न होने पर 48 वर्षीय बेटे द्वारा अपने बुजुर्ग माता-पिता की बेरहमी से की गई हत्या ने समाज को हिलाकर रख दिया है. लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस औलाद को नौ महीने कोख में पाला और उम्र भर की कमाई उस पर लुटा दी, उसके दिल में इतना विषैला जहर कहां से भर जाता है? क्या यह परवरिश की कमी है या कानूनी समझ से अनजान होने का नतीजा.
विषैले रिश्तों को मनोवैज्ञानिक सच
माता-पिता और बच्चों के रिश्तों में विषैला जहर रातों-रात नहीं भरता. इसके पीछे के मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझना होगा. बचपन से भौतिक सुख-सुविधाओं को प्राथमिकता में रखना, नैतिकता का पाठ नहीं पढ़ाना और संपत्ति को लेकर पारदर्शिता न होना इसके मुख्य कारण हो सकते हैं लेकिन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से कोई भी संबंध रातों-रात या अचानक हिंसक नहीं बनता. यह साल दर साल धीरे-धीरे पनप रही मानसिक विकृतियों का परिणाम होता है. साइकोलॉजी में नारसिस्टिक पैरेंटिंग एक शब्द है. कई बार कई बार माता-पिता अपने बच्चों को एक स्वतंत्र व्यक्ति मानने के बजाय अपनी संपत्ति समझने लगता है या अपनी इच्छाओं को पूरा करने का साधन मान लेते हैं. इसे ही नारसिस्टिक पैरेंटिंग कहा जाता है. इसमें माता-पिता को लगता है कि इसे मैंने पैदा किया है तो जिस तरह से मैं इसे बनाना चाहता हूं वह वही करे. बचपन में डर या दबाव के कारण उनकी सारी बातें पूरी होने लगती है तो माता-पिता को और बल मिलता है. लेकिन जैसे ही बच्चे बड़े होते हैं और अपनी मनमानी करने लगते हैं तो माता-पिता इसे विद्रोह या अपमान समझते लगते हैं. इससे दोनों के बीच संवाद बंद होने लगता है और केवल नियंत्रण की जंग शुरू हो जाती है. दूसरी ओर इसका उलट भी है. यही बात बच्चे अपने दृष्टिकोण से समझते हैं. जब बच्चों को शुरुआत से ही बिना किसी प्रयास के सब कुछ मिलता रहा हो, तो उनमें एंटाइटेलमेंट कॉम्प्लेक्स विकसित हो जाता है. मतलब बच्चा यह मानने लगता है कि माता-पिता की कमाई और संपत्ति पर उसका स्वाभाविक और पूर्ण अधिकार है. जब माता-पिता उसकी किसी मांग को खारिज करते हैं या संपत्ति उनके नाम करने से मना करते हैं, तो बच्चे में अत्यधिक घृणा और हिंसक भावनाएं उत्पन्न होने लगती हैं. कोल्हापुर के मामलों में शायद यही बात सामने आई होगी.
बचपन का ट्रॉमा और अटैचमेंट डिसऑर्डर
कई बार बच्चे माता-पिता के साथ असुरक्षित जुड़ाव में बंधा रहता है.यदि बचपन में बच्चों को माता-पिता की तरफ से भावनात्मक सुरक्षा नहीं मिलती या केवल आलोचना मिली है तो उसके भीतर माता-पिता के प्रति एक गहरा आक्रोश जमा होने लगता है. बड़े होने पर यह कड़वाहट गंभीर विवादों में बदल जाती है. इसी तरह जब किसी परिवार में समस्याओं पर खुलकर बात करने के बजाय उन्हें दबाया जाता है, तो वहां पैसिव अग्रेसिव वाला माहौल बन जाता है. यानी एक-दूसरे के प्रति मन में जहर घुलने लगता है जो छोटी-छोटी बातों पर फट पड़ती है. यह छोटी-छोटी बातें सालों तक मन में पकी रहती हैं. समय के साथ यह भावनात्मक दूरी इतनी बढ़ जाती है कि दोनों एक-दूसरे के प्रति अपनी संवेदनशीलता पूरी तरह खो देते हैं. जब संवेदनशीलता खत्म होती है, तभी हिंसा जन्म लेती है. आज जिस तरह का समाज बन रहा है उसमें व्यक्ति की पहचान और खुशी उसकी भौतिक संपत्ति से जुड़ गई है. इसलिए आज रिश्तों का मूल्यांकन प्रेम और सम्मान के बजाय जमीन, मकान और बैंक बैलेंस के आधार पर होने लगा है. इस तरह के रिश्तों में इंसानियत खो जाती है. ऐसी स्थिति में औलाद को जन्म देने वाले माता-पिता में सिर्फ अपनी राह का रोड़ा नजर आने लगता है.
बचपन से ही दें ये संस्कार ताकि न बिगड़े औलाद
माता-पिता की कत्ल तक मामले का पहुंचना बेशक विरले है लेकिन हर माता-पिता को अपने बच्चों में शुरुआत से ही कुछ संस्कार देने चाहिए ताकि आगे जाकर ऐसी नौबत न आए. बच्चों को कोई भी चीज तुरंत में न दें. पैसा देने से पहले उसमें पहले संस्कार दें. उसे समझाएं कि ये चीज कितने महत्व का है और उसे खरीदने से पहले उन पैसे के बारे में बताएं कि इसका क्या महत्व है. बच्चों को बचपन से ही यह समझाएं कि उन्हें अपने दम पर पहचान बनानी है. माता-पिता की संपत्ति पर निर्भर रहने के बजाय अपनी मेहनत पर भरोसा करना सिखाएं. उसे कहानियों और सच घटनाओं पर आधारित नैतिक मूल्य और कृतज्ञता का पाठ पठाएं. जब भी कोई प्रेरक प्रसंग वाली कहानी सामने आए तो उसे ये बताएं. हमारे धर्म ग्रंथों में माता-पिता और बच्चों के प्रेम से संबंधित हजारों कहानियां हैं, इन्हें बताएं. शुरुआत में जानवरों को कहानी में पिरोकर बताएं. फिर असली कहानी सुनाएं. बच्चों को यह अहसास कराएं कि रिश्तों की कीमत पैसों से कहीं ज्यादा होती है. उनमें बुजुर्गों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव विकसित करें. अपने बच्चों के साथ हमेशा सहज संवाद रखें. बच्चों को प्यार करना जरूरी है लेकिन अति-लाड़-प्यार से बचें. बच्चों की हर नाजायज मांग को पूरा करने से बचें. उन्हें ना सुनने की आदत डालें ताकि आगे चलकर उनमें सब्र और संतोष रहे.
हर माता-पिता बच्चों के लिए पहले ही कर दें ये 3 काम
बाद में किसी तरह की दिक्कत न हो, बच्चे आपकी ही संपत्ति से आपको बेदखल न कर दें और आप पर जानलेवा हमले न हो, इसके लिए हर माता-पिता को सही उम्र और समय रहते ठोस कानूनी उपाय अपना लेने चाहिए. इससे माता-पिता का जीवन सुरक्षित रहता है और बच्चों के बीच भविष्य में होने वाली कड़वाहट भी खत्म होती है.
- पंजीकृत वसीयत : सबसे पहले अपनी वसीयत बनाइए. भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 की धारा 57 और 63 के तहत कोई भी व्यक्ति अपनी वसीयत बना सकता है. हालांकि भारत में वसीयत का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है लेकिन रजिस्ट्रेशन अधिनियम, 1908 की धारा 18 के तहत सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में इसका पंजीकरण करा सकते हैं. इससे आपकी वसीयत को कानूनी मान्यता मिल जाएगी. भविष्य में किसी तरह के विवाद को रोकने के लिए वसीयत में हमेशा वसीयत का कारण स्पष्ट लिखें. इसमें लिखें कि किस बच्चे को क्या संपत्ति क्यों दी जा रही है या क्यों नहीं दी जा रही है. जब वसीयत में माता-पिता की स्पष्ट सोच और कारण लिखे होते हैं, तो बच्चे माता-पिता को विलेन नहीं मानते और न ही बाद में इसे धोखाधड़ी या दबाव में बनाई गई वसीयत बताकर कोर्ट में चुनौती दे पाते हैं. वसीयत में किसी भरोसेमंद व्यक्ति को इसका निष्पादक जरूर बनाएं ताकि माता-पिता के बाद इसका शांतिपूर्ण बंटवारा कर दें.
- आजीवन हित: संपत्ति अंतरण अधिनियम 1882 के तहत माता-पिता अपनी संपत्ति पर आजीवन अपने अधिकार को सुरक्षित रख सकते हैं. यदि माता-पिता अपने जीवनकाल में ही बच्चों के नाम रजिस्ट्री या गिफ्ट डीड कर रहे हैं, तो उसमें यह शर्त स्पष्ट रूप से दर्ज कराएं कि जब तक माता-पिता में से कोई भी एक जीवित हैं, तो संपत्ति पर पूर्ण कब्जा, किराया पाने का हक और उपयोग का अधिकार उन्हीं का रहेगा. उनके जीवित रहते बच्चा न तो संपत्ति बेच सकता है और न ही उन्हें घर से निकाल सकता है. इससे बच्चे समय से पहले संपत्ति हथियाने के लिए उतावले या हिंसक नहीं बनते.
- सुरक्षा कवच : वरिष्ठ नागरिक अधिनियम (2007) के तहत अगर माता-पिता वसीयत में अपने बच्चों के नाम संपत्ति करता है तो बच्चों को उन्हें आजीवन देखभाल करना पड़ेगा. इतना ही नहीं अगर किसी भी तरह से औलाद माता-पिता को प्रताड़ित करता है या भरण-पोषण नहीं करता है तो मैंटेनेंस ट्रिब्यूनल औलाद की दी गई संपत्ति को अवैध घोषित कर सकता है और संपत्ति पर दोबारा माता-पिता का हक हो सकता है. अंत में इस कानून की जानकारी बच्चों को पहले से होना ही अपने आप में एक बड़ा मनोवैज्ञानिक रोकथाम है या यूं कहें कि माता-पिता के पास सबसे बड़ा हथियार है.
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मीडिया में 20 साल से ज्यादा का अनुभव रखने वाले लक्ष्मी नारायण पत्रकारिता के हर विधा में माहिर हैं. भविष्य की आहट और ट्रेंड्स को समय से पहले भांपने की अद्भुत कला उनके अंदर समाहि…
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September 02, 2026, 14:22 IST









