हाल में अभिनेत्री शहाना गोस्वामी ने एक इंटरव्यू में कहा कि वह “ओपन रिलेशनशिप” में हैं. उनके जीवन में “एक से अधिक पार्टनर” हैं. उन्होंने यह भी कहा कि उनके रिश्ते “कैजुअल” नहीं हैं, बल्कि भावनात्मक और ईमानदार हैं. इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई – क्या आज रिश्तों की परिभाषा बदल रही है? क्या ओपन रिलेशनशिप, सिचुएशनशिप, बेंचिंग, घोस्टिंग जैसे शब्द नई पीढ़ी के प्रेम और अकेलेपन की नई भाषा हैं.
दुनियाभर में रिश्तों के तरीके और शर्तें तेजी से बदल रही हैं. भारत भी उससे अलग नहीं है. ये जरूर हो सकता है कि अभी ये बातें बड़े स्तर पर नहीं हैं और ना ही बड़े स्तर पर स्वीकार्य हैं लेकिन नई युवा पीढ़ी तेजी से इसओर कदम बढ़ा रही है. वो रिश्तों को नए तरीके से जीने और देखने लगी है. इस तरह का ट्रेंड्स 2020 के दशक में ज्यादा तेजी से दुनिया को बदलने लगा है.
अब केवल “बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड” या “पति-पत्नी” जैसी पारंपरिक परिभाषाएं नहीं रहीं. डिजिटल कल्चर, डेटिंग ऐप्स, शहरी अकेलापन, करियर-केन्द्रित जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती चाह ने रिश्तों के कई नए रूप पैदा किए हैं.
जब अभिनेत्री शहाना गोस्वामी ने कहा कि वह ओपन रिलेशनशिप में हैं. उनके जीवन में कई लोग हैं, जिनसे अलग-अलग तरह के भावनात्मक या शारीरिक संबंध हैं. उन्होंने साफ कहा कि “प्यार में नियम और नियंत्रण” जरूरी नहीं.
क्या होती है ओपन रिलेशनशिप?
ओपन रिलेशनशिप ऐसा अरेंजमेंट है, जिसमें दो लोग आपसी सहमति से तय करते हैं कि वे एक-दूसरे के अलावा अन्य लोगों से भी भावनात्मक या शारीरिक संबंध रख सकते हैं. ये चीटिंग से अलग माना जाता है क्योंकि इसमें पारदर्शिता और सहमति होती है. इसके भी कई रूप हैं-
1. मोनोगैमिश – दो लोग मुख्य पार्टनर होते हैं लेकिन कुछ सीमित परिस्थितियों में दूसरे लोगों से जुड़ सकते हैं.
2. पॉलीअमरी – एक व्यक्ति एक साथ कई लोगों से प्रेम संबंध रख सकता है और सभी को इसकी जानकारी होती है.
3. रिलेशनशिप एनार्की – इसमें रिश्तों को किसी तय ढांचे में नहीं बांधा जाता. दोस्ती, प्रेम और साझेदारी की सीमाएं लचीली होती हैं.
4. कैजुअल ओपन रिलेशन – भावनात्मक गहराई कम और स्वतंत्रता अधिक होती है.
भारत में अभी ये अवधारणा सीमित शहरी वर्ग तक ही दिखाई देती है, लेकिन डेटिंग ऐप्स और सोशल मीडिया ने इसे चर्चा का हिस्सा बना दिया है.
सिचुएशनशिप क्या है
ये ऐसा रिश्ता होता है जिसमें दो लोग भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं, साथ समय बिताते हैं, कभी-कभी शारीरिक संबंध भी होते हैं, लेकिन वे अपने रिश्ते को कोई स्पष्ट नाम नहीं देते. न वह पूरी तरह दोस्ती होती है, न प्रेम संबंध. मतलब ये होता है – “हम साथ हैं भी और नहीं भी.” इस तरह के रिश्ते अक्सर इसलिए बनते हैं क्योंकि लोग “कमिटमेंट” से बचना चाहते हैं, लेकिन अकेले भी नहीं रहना चाहते.
बेंचिंग क्या है?
ये शब्द बेंच खेलों से आया है. जैसे क्रिकेट या फुटबॉल में खिलाड़ी को रिजर्व में बैठाया जाता है, वैसे ही रिश्तों में “बेंचिंग” का मतलब है किसी व्यक्ति को पूरी तरह छोड़ना नहीं है लेकिन प्राथमिकता भी नहीं देना है. इसमें ये चीजें होती हैं
– कभी-कभार मैसेज करना
– उम्मीद बनाए रखना
– लेकिन गंभीर रिश्ता नहीं बनाना
यानी सामने वाले को “वेटिंग लिस्ट” में रखना. डेटिंग ऐप्स के दौर में यह व्यवहार बढ़ा है क्योंकि लोगों को हमेशा लगता है कि शायद कोई “बेहतर विकल्प” मिल जाए.
घोस्टिंग मतलब अचानक गायब हो जाना
यह आज की डिजिटल संस्कृति का सबसे आम और सबसे क्रूर व्यवहार माना जाता है. घोस्टिंग का मतलब है अचानक संपर्क खत्म कर देना. मैसेज या कॉल का जवाब नहीं देना. बिना किसी स्पष्टीकरण के गायब हो जाना. मनोवैज्ञानिक इसे भावनात्मक असुरक्षा और टकराव से बचने की प्रवृत्ति से जोड़ते हैं.
यह बदलाव आया कैसे
टिंडर, बम्बल और हिंज जैसे ऐप्स ने रिश्तों को “चॉइस” आधारित बना दिया, जिसमें लोगों के सामने बहुत से विकल्प हैं. पहले विवाह सामाजिक आवश्यकता था. अब शहरी युवाओं के लिए यह “व्यक्तिगत चुनाव” बनता जा रहा है. नई पीढ़ी अपने करियर, निजी स्पेस और मानसिक स्वतंत्रता को बहुत महत्व देती है. महानगरों में लाखों लोग परिवार से दूर रहते हैं। रिश्ते भावनात्मक सहारे का साधन बनते हैं, लेकिन स्थायित्व कम होता है. इंस्टाग्राम और डिजिटल लाइफस्टाइल ने रिश्तों में तुलना और असुरक्षा भी बढ़ाई है.
क्या पश्चिम से आया ये चलन
काफी हद तक हां कह सकते हैं. 1960 और 70 के दशक में अमेरिका और यूरोप में सेक्सुअल रेवोल्यूशन हुआ. उस दौर में विवाह और सेक्स को लेकर पारंपरिक धारणाओं को चुनौती दी गई. “फ्री लव”, लिव -इन रिलेशन और ओपन मैरिज जैसे विचार वहीं से लोकप्रिय हुए. हालांकि भारतीय समाज में भी रिश्तों की विविधता हमेशा मौजूद रही है.
रिलेशनशिप के इन विकल्पों पर कानून क्या कहता है
भारत का कानूनी ढांचा अब भी मुख्यतौर पर विवाह केंद्रित ही है. हालांकि भारत का कानून मुख्यतौर पर तीन बातों पर ध्यान देता है.
– क्या रिश्ता सहमति से है
– क्या उसमें धोखा, जबरदस्ती या शोषण है.
– क्या वह विवाह कानूनों का उल्लंघन करता है
इसी आधार पर अलग-अलग रिश्तों की स्थिति समझी जा सकती है।
ओपन रिलेशनशिप पर कानून क्या कहता है?
“ओपन रिलेशनशिप” नाम की कोई अलग कानूनी श्रेणी भारत में नहीं है. यानी न यह कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त संस्था है, न इसे अपराध घोषित किया गया है.
अगर दो वयस्क आपसी सहमति से किसी रिश्ते में हैं, तो भारतीय कानून सामान्यतौर पर उसमें दखल नहीं देता. समस्या तब आती है जब व्यक्ति शादीशुदा हो
और विवाह कानूनों का उल्लंघन हो रहा हो.
क्या शादीशुदा व्यक्ति ओपन रिलेशन रख सकता है?
सामाजिक रूप से विवादित हो सकता है, लेकिन केवल सहमति से बने शारीरिक संबंध अब अपने-आप में अपराध नहीं हैं. वर्ष 2018 में जोसेफ साइनी बनाम संघीय भारत मामले में सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 497 (व्यभिचार) को असंवैधानिक घोषित कर दिया.
इसका मतलब विवाहेतर संबंध अब अपराध नहीं हैं लेकिन वे तलाक का आधार हो सकते हैं. यानि ऐसे मामलों में जेल नहीं होगी लेकिन पति या पत्नी अदालत में तलाक मांग सकते हैं.
लिव-इन रिलेशनशिप की कानूनी स्थिति
भारत में लिव-इन रिलेशन पूरी तरह गैरकानूनी नहीं है. कई फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दो बालिग अगर साथ रहना चाहें तो ये उनका अधिकार है.
पॉलीअमरी और एक से अधिक पार्टनर
यहां कानून थोड़ा सख्त हो जाता है. हिंदू विवाह कानून के तहत एक समय में एक ही वैध विवाह मान्य है. दूसरा विवाह करने पर “बायगैमी” (दोहरी शादी) का मामला बन सकता है. आप कई लोगों से भावनात्मक संबंध रखें, यह अपराध नहीं लेकिन कानूनी शादी एक से ज्यादा नहीं कर सकते.
सिचुएशनशिप और कैजुअल रिलेशन
इनके लिए कोई अलग कानून नहीं है. कानून तब हस्तक्षेप करता है जब धोखा हुआ हो, झूठे विवाह के वादे पर संबंध बने हों, आर्थिक शोषण हो, निजी तस्वीरें फैलायी जाएं या सहमति का उल्लंघन हो.









