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Married women suicide cases : भोपाल की ट्विशा के बाद नोएडा की दीपिका की संदिग्ध मौत ने देश को झकझोर दिया है. एक तरफ जहां ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत, चैट में मानसिक शारीरिक प्रताड़ना की बात सामने आ रही है, वहीं 1 करोड़ का दहेज और फॉर्च्यूनर देने के बाद भी 24 साल की दीपिका को छत से कूदने जैसी खबरें हर परिवार का दिल दहला रही है. आखिर आलीशान घरों और रसूख के बाद भी हमारी बेटियां इतनी बेबस और असुरक्षित क्यों हो रहीं हैं?
आखिर आलीशान घरों और रसूख के बाद भी हमारी बेटियां इतनी बेबस और असुरक्षित क्यों हो रहीं हैं?
इन दोनों ही मामलों ने हर उस परिवार का दिल दहला दिया है जिनकी बेटियां आज पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हैं. इन घटनाओं को देखकर दिल दिमाग में एक ही सवाल कौंधता है- आखिर हमारी बेटियां डिग्री, करोड़ों के दहेज और ससुराल के बड़े रसूख के बाद भी असुरक्षित क्यों हैं?
रसूख और पैसा क्या ‘सोने का पिंजरा’?
हम बड़े गर्व से कहते हैं कि जमाना बदल गया है. हम बेटियों को पढ़ा रहे हैं, उन्हें आसमान छूने के मौके दे रहे हैं. लेकिन कड़वा सच यह है कि शादी के बाजार में आज भी लड़कियों को उनकी काबिलियत से नहीं, बल्कि मायके से मिलने वाले ‘दहेज’ के तराजू पर तोला जाता है.
भोपाल की ट्विशा हो या नोएडा की दीपिका, दोनों ही ऐसे परिवारों से ताल्लुक रखती थीं जहां पैसों या रुतबे की कोई कमी नहीं थी. लेकिन इन आलीशान घरों की चारदीवारी के पीछे जो चल रहा था, उसे ‘डोमेस्टिक टेरर’ (घरेलू आतंकवाद) के अलावा कोई और नाम नहीं दिया जा सकता. यह एक ऐसा सुनहरा पिंजरा है, जहां बाहर से सब कुछ चमकीला दिखता है, लेकिन अंदर सिर्फ घुटती हुई सांसें होती हैं.
हर दिन मिलने वाले ताने, ब्लैकमेलिंग और ‘और पैसे लाओ’ की जिद किसी भी इंसान के आत्मसम्मान को धीरे-धीरे छलनी कर देती है और अंत में दीपिका जैसा खुद को चक्रव्यूह में फंसा पाकर उसे जिंदगी से आसान मौत लगने लगती है.
‘लोग क्या कहेंगे’ एक जानलेवा डर
एक बड़ा सवाल मायके वालों पर भी उठता है. जब एक पिता बेटी की शादी में एक करोड़ रुपये और फॉर्च्यूनर गाड़ी दे सकता है, तो वो अपनी प्रताड़ित होती बेटी को वापस अपने घर लाने का हौसला क्यों नहीं दिखा पाता? हमारे समाज का सबसे बड़ा रोग है ‘लोग क्या कहेंगे’. ऐसे में मां पिता भी उसे ‘एडजस्ट’ करने की सलाह भर देकर अपना पल्ला झाड़ देते हैं.
बेटियां अक्सर ससुराल का नरक सिर्फ इसलिए सहती रहती हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि अगर वो वापस लौट आईं, तो समाज उनके माता-पिता को जीने नहीं देगा. डोली उठने के बाद अर्थी ही निकलेगी, इस रूढ़िवादी सोच को अब कचरे के डिब्बे में फेंकने का वक्त आ गया है.
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मैंने लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर वूमन से अपनी ग्रेजुएशन और मिरांडा हाउस से मास्टर्स की डिग्री पूरी की है. पत्रकारिता करियर की शुरुआत दूरदर्शन(2009) से की, जिसके बाद दैनिक भास्कर सहित कई प्रमुख अख़बारों में मेनस्ट्र…
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