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Biggest Pain of Motherhood: क्या मां अपने बच्चे को इसलिए पैदा करता है ताकि एक दिन उसे मां की कुछ भी जरूरत न हो. क्या माँ-बाप बच्चे को बड़ा ही इसलिए करते हैं ताकि एक दिन वह अपनी दुनिया में चला जाए. यह दर्द है भारतीय राजनेता और पावरफुल मॉम स्मृति ईरानी का. आज स्मृति ईरानी के इस झकझोरने वाले दर्द पर हर तरफ चर्चा हो रही है कि क्या वास्तव में हमारा समाज ऐसा हो रहा है. लेकिन उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी इस पर भावुक पोस्ट किया है. उन्होंने लिखा , मैं मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकता. तुम्हारी याद आज भी पहाड़ हिलाने का हौसला देती है.
स्मृति ईरानी ने बयां की मां का दर्द.
Biggest Pain of Motherhood : हमारा समाज बदल गया है. लेकिन क्या इतना बदल गया कि अब कुछ समय बाद बच्चों को अपने मां-बाप की जरूरत ही नहीं महसूस होगी. स्मृति ईरानी ने एक कार्यक्रम के दौरान जो बातें कही वो सच में किसी भी संवेदनशील इंसान को रूला सकता है. “माँ होना एक ऐसा काम है जो तभी सही मायने में पूरा माना जाता है जब बच्चे को आपकी ज़रूरत ही न रहे. और यही सबसे ज़्यादा दिल तोड़ने वाली बात है. आप किसी को इसलिए पाल-पोसकर बड़ा कर रहे हैं ताकि आप उन्हें जाने दे सकें. आप किसी को ऐसा बना रहे हैं जो आगे चलकर आपको भूल जाए, जिसे कभी आपकी ज़रूरत ही न पड़े. आप अपनी ज़िंदगी का आधा हिस्सा इस बात में लगा देते हैं कि ज़िंदगी के बाकी आधे हिस्से में आपको भुला दिया जाए. अंत में आपके पास बस एक तस्वीर, एक याद या एक मैसेज रह जाता है.” स्मृति ईरानी का यह दर्द आज के समय में मां बनने का सबसे बड़ा दर्द है.
आनंद महिंद्रा का मरहम
हाल ही स्मृति ईरानी ने मुंबई में आयोजित मॉम पावर कॉन्फ्रेंस 2026 के दौरान मातृत्व, कामकाजी माताओं के संघर्ष और बच्चों के बड़े होने की कड़वी सच्चाई पर बहुत ही भावुक और दिल को छू लेने वाला यह भाषण दिया था. इसके बाद मां और बच्चों के बीच कड़वे रिलेशनशिप पर बहस छिड़ गई थी लेकिन इसमें सबसे खूबसूरत मोड़ तब आया जब आनंद महिंद्रा ने स्मृति ईरानी के भुला दिए जाने वाले डर से बड़े ही सम्मान के साथ अपनी असहमति जताई. उन्होंने अपनी दिवंगत मां को याद करते हुए लिखा कि मैंने अपनी मां की अंतिम सांस तक न केवल उनसे अगाध प्रेम किया, बल्कि उनकी सेवा भी की. उनके जीवन के सबसे बुरे दौर में भी उनकी मां का प्यार ही वह ताकत था, जिसने उन्हें यह एहसास कराया कि वे पहाड़ों को भी हिला सकते हैं. आनंद महिंद्रा का यह जवाब असल में दुनिया के हर उस बेटे की आवाज बन गया, जो अपनी सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद भी अपनी जड़ों और अपनी माँ के त्याग को कभी नहीं भूलता.
पैसे से सब कुछ लेकिन मां का प्यार नहीं
इस कार्यक्रम में स्मृति ईरानी से पूछा गया कि आप मां बनने के संघर्ष को किस तरह देखते हैं. इस सवाल के जवाब में स्मृति ईरानी ने कार्यक्रम में शामिल महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा, क्या यहां कोई वर्किंग मदर है? क्या आपको याद है कि उन सालों में क्या-क्या हुआ था? सच कहूं तो किसी भी महिला को कुछ याद नहीं रहता, सिवाय इसके कि उन्हें हर हाल में काम पूरा करना था. उन्हें अपने बच्चे को खाना खिलाना था, होमवर्क पूरा कराना था और साथ ही अपनी प्रेजेंस भी तैयार रखनी थी. वे कई-कई रातें सोई नहीं हैं. और फिर जब वही बच्चे थोड़े बड़े होकर बहस करने लगते हैं, तो माताएं सोचती हैं कि मैं तो अभी इनके नैपी बदल रही थी और अब यह मुझसे ही बहस कर रहे हैं! अक्सर लोग महिलाओं को यह कहकर टाल देते हैं कि वे बहुत भावुक होती हैं. लेकिन लोग यह नहीं समझते कि यही भावना हमें ईमानदारी से काम पूरा करने, कड़ी मेहनत करने और समस्याओं से लड़कर वापस खड़े होने की ताकत देती है. पैसा दुनिया की हर चीज़ खरीद सकता है, लेकिन वह किसी महिला की जिद्द, हिम्मत और एक मां का प्यार कभी नहीं खरीद सकता.
पहाड़ों को हिलाने की शक्ति मां से मिली
स्मृति ईरानी के इस पोस्ट पर आनंद महिद्रा ने जवाब दिया, उन्होंने लिखा-“यह सिर्फ उस कमरे में मौजूद कुछ महिलाओं की बात नहीं है, आपने मेरे सहित कई पुरुषों की आँखों में भी आँसू ला दिए. स्मृति ईरानी ने एक मां होने का दर्द और आनंद कितने शक्तिशाली और भावनात्मक रूप से व्यक्त किया गया है. मेरी केवल एक बात पर असहमति है. मैंने अपनी मां की अंतिम सांस तक उनसे अगाध प्रेम किया और उनकी देखभाल की. क्योंकि उनके प्यार की जिस दृढ़ता का आपने जिक्र किया, उसके प्रति मेरे मन में अत्यधिक कृतज्ञता थी. मेरे सबसे बुरे दौर में भी उन्होंने मुझे यह एहसास कराया कि मैं पहाड़ों को भी हिला सकता हूं. एक भी दिन ऐसा नहीं जाता जब मुझे उनकी यादों से ताकत न मिलती हो. मुझे पूरा यकीन है कि आपका बेटा भी इससे अलग नहीं होगा.
रिश्तों की वह डोरी जो वक्त के पार भी नहीं टूटती
यह पूरा मामला दरअसल आधुनिक दौर में घटते पारिवारिक मूल्यों और बिखरते रिश्तों के बीच एक नई उम्मीद की किरण जगाता है. आज का जमाना रील्स से शुरू होती है और रील्स पर खत्म होती है. इसमें किसी के लिए कोई भावना नहीं है. एक तरफ जहां यह माताओं के उस अनकहे डर और एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम की कड़वी हकीकत को उजागर करता है, वहीं दूसरी तरफ यह साबित करता है कि सच्चे रिश्तों की उम्र कभी खत्म नहीं होती. मां का दिया हुआ प्यार और संस्कार वक्त की धुंध में खोते नहीं हैं बल्कि वे बच्चे की रगों में हौसला बनकर हमेशा दौड़ते रहते हैं. एक मां भले ही यह सोचकर डरती रहे कि एक दिन उसकी ज़रूरत खत्म हो जाएगी लेकिन सच तो यह है कि एक बच्चे के लिए मां का वजूद कभी पुराना नहीं होता. वह जीवन के हर पड़ाव पर ताकत का सबसे बड़ा जरिया बनी रहती है. कम से कम संवेदनशील बच्चों के लिए.
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लक्ष्मी नारायण पत्रकारिता जगत का ऐसा नाम हैं, जो भविष्य की आहट और ट्रेंड्स को समय से पहले भांप लेते हैं. मीडिया में 20 साल का अनुभव है और वर्तमान में न्यूज 18 …
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August 07, 2026, 18:33 IST









