क्या आपके साथ भी कभी ऐसा होता है कि ऑफिस से एक दिन की छुट्टी लेने पर आपको अंदर ही अंदर घबराहट होने लगती है? या फिर किसी दोस्त को किसी काम के लिए ‘ना’ कहने पर आपको ऐसा लगता है जैसे आपने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो? यहाँ तक कि अपने लिए कोई महंगी चीज़ खरीदने या वीकेंड पर सिर्फ आराम करने में भी आपको एक अजीब सा पछतावा घेर लेता है. अगर आपका जवाब ‘हाँ’ है, तो थोड़ा ठहरिए.
क्या आप बिना किसी गलती के भी सामने वाले को खुश करने के लिए हर बात में सबसे पहले ‘सॉरी’ कह देते हैं?
बेवजह हर छोटी-बड़ी बात पर खुद को ही कसूरवार मान लेना कोई सामान्य बात नहीं है. मनोविज्ञान की भाषा में इसे ‘क्रोनिक गिल्ट’ (Chronic Guilt) कहा जाता है. आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी और सोशल मीडिया के दौर में बहुत से लोग अनजाने में इस मानसिक स्थिति का शिकार हो रहे हैं. आइए समझते हैं कि यह क्रोनिक गिल्ट आखिर क्या है और इससे बाहर कैसे निकला जाए.
आखिर क्या होता है यह ‘क्रोनिक गिल्ट’?
जब हम कोई सचमुच की गलती करते हैं और उसके बाद जो पछतावा होता है, उसे ‘नॉर्मल गिल्ट’ कहते हैं. वह हमें अपनी गलती सुधारने का मौका देता है. लेकिन क्रोनिक गिल्ट एक ऐसी बीमारी की तरह है, जिसमें इंसान बिना किसी ठोस वजह के भी हर वक्त खुद को ही दोषी ठहराता रहता है. उसे हर समय ऐसा महसूस होता है कि वह दूसरों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा है, या वह एक अच्छा पार्टनर, अच्छा माता-पिता या अच्छा कर्मचारी नहीं है.
कैसे लंबे समय का तनाव आपको धकेलता है डिप्रेशन में
जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक अत्यधिक तनाव (Chronic Stress) से गुजरता है, तो उसका शरीर लगातार ‘कोर्टिसोल’ (Cortisol) नामक स्ट्रेस हार्मोन रिलीज करता रहता है. यह बढ़ा हुआ कोर्टिसोल स्तर धीरे-धीरे दिमाग के रासायनिक संतुलन को बिगाड़ देता है, जिससे खुशी और उत्साह महसूस कराने वाले न्यूरोट्रांसमीटर, जैसे कि सेरोटोनिन (Serotonin) और डोपामाइन (Dopamine), का बनना काफी कम हो जाता है. इसके अलावा, लगातार रहने वाला तनाव दिमाग के उस हिस्से (Hippocampus) को भी सिकोड़ देता है जो हमारी याददाश्त और भावनाओं को नियंत्रित करता है. नतीजा यह होता है कि इंसान हर वक्त उदास, थका हुआ और निराश महसूस करने लगता है, और यही स्थिति धीरे-धीरे उसे गंभीर डिप्रेशन (अवसाद) की ओर धकेल देती है.
इन 4 बड़े लक्षणों से पहचानें इसे-
बात-बात पर ‘सॉरी’ बोलना: क्या आप बिना किसी गलती के भी सामने वाले को खुश करने के लिए हर बात में सबसे पहले ‘सॉरी’ कह देते हैं?
बाउंड्री सेट न कर पाना: किसी को ‘ना’ न कह पाना और अगर कह दिया, तो रात भर उसी सोच में घुटते रहना.
खुद की खुशियों पर पाबंदी: जब आप खुश होते हैं या आराम कर रहे होते हैं, तब भी दिमाग में एक गिल्ट चलता है कि ‘मैं अपना समय बर्बाद कर रहा हूँ.’
दूसरों के मूड की जिम्मेदारी लेना: अगर घर या ऑफिस में कोई दूसरा व्यक्ति परेशान या गुस्से में है, तो यह मान लेना कि यह आपकी ही किसी गलती की वजह से हुआ है.
इस मानसिक जाल से बाहर निकलने के उपाय-
इस गिल्ट के जाल से बाहर निकलना नामुमकिन नहीं है. बस आपको अपने सोचने का तरीका थोड़ा सा बदलना होगा:
तथ्यों को देखें, भावनाओं को नहीं: जब भी गिल्ट महसूस हो, तो खुद से एक सवाल पूछें—”क्या सचमुच इस स्थिति के लिए मैं जिम्मेदार हूँ?” अगर जवाब ‘ना’ है, तो गहरी सांस लें और उस विचार को जाने दें.
‘ना’ कहना सीखें: यह समझना बेहद जरूरी है कि हर किसी को हर वक्त खुश रखना आपके वश में नहीं है. अपनी मानसिक शांति के लिए हेल्दी बाउंड्रीज तय करना स्वार्थ नहीं, बल्कि सेल्फ-केयर है.
खुद को माफ करना सीखें: इंसान गलतियों का पुतला है. अगर अतीत में कोई भूल हो भी गई है, तो खुद को बार-बार कोसने के बजाय उससे सीख लें और आगे बढ़ें.
जिंदगी में हर जिम्मेदारी को निभाते-निभाते कहीं खुद के प्रति सख्त मत हो जाइए. खुद से भी उतना ही प्यार और सहानुभूति रखिए, जितनी आप दूसरों से रखते हैं.
क्या आपको भी अक्सर ऐसा गिल्ट महसूस होता है? जानकारी अच्छी लगी हो, तो इसे अपने उन दोस्तों और फैमिली मेंबर्स के साथ जरूर शेयर करें जो हर बात पर बहुत ज्यादा सोचते हैं!









