Highlights
- 19 साल बाद कोलकाता पहुंचीं तसलीमा नसरीन, एयरपोर्ट पर भावुक होकर किया लोगों का अभिवादन।
- शनिवार को साहित्यिक कार्यक्रम में लेंगी हिस्सा, अभिव्यक्ति की आजादी पर फिर होगी चर्चा।
- 2007 के विवाद के बाद छोड़ा था कोलकाता, अब बदले राजनीतिक माहौल में हुई वापसी।
कोलकाता: बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन करीब 19 साल बाद शुक्रवार को कोलकाता पहुंचीं। उन्होंने इस वापसी को भावुक पल बताते हुए कहा कि ऐसा महसूस हो रहा है जैसे वह अपने ही देश लौट आई हों। कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर पहुंचने के बाद तसलीमा नसरीन ने हाथ जोड़कर उनका स्वागत करने आए लोगों का अभिवादन किया और कहा, ‘मैं यहां वापस आकर बहुत अच्छा महसूस कर रही हूं।’ बता दें कि यह नवंबर 2007 के बाद उनकी पहली कोलकाता यात्रा है। उस समय उनकी किताबों और लेखन को लेकर हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें शहर छोड़ना पड़ा था।
शनिवार को साहित्यिक कार्यक्रम में होंगी शामिल
तसलीमा नसरीन शनिवार को रवींद्र सदन में आयोजित धार्मिक कट्टरवाद के विरोध पर आधारित एक साहित्यिक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी। इस कार्यक्रम में वह कविता पाठ भी करेंगी। कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और प्रसिद्ध लेखक शीर्षेंदु मुखोपाध्याय समेत कई प्रमुख हस्तियों के शामिल होने की उम्मीद है। हालांकि यह कार्यक्रम साहित्य पर केंद्रित है, लेकिन पश्चिम बंगाल में बीजेपी सरकार बनने के बाद इसका राजनीतिक महत्व भी बढ़ गया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दों पर फिर से चर्चा तेज हो गई है।
‘ऐसा लग रहा है जैसे अपने ही देश लौट रही हूं’
कोलकाता आने से पहले तसलीमा नसरीन ने कहा था कि यहां लौटना उनके लिए अपने देश लौटने जैसा है। तसलीमा अक्सर कोलकाता को बांग्लादेश छोड़ने के बाद अपना दूसरा घर बताती रही हैं। उन्होंने कहा,
‘मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं अपने ही देश लौट रही हूं। मेरे दिल में बंगाल कभी सीमा या कंटीले तारों से बंटा नहीं। पूर्वी बंगाल के दरवाजे मेरे लिए बंद हैं, इसलिए फिलहाल बंगाल का यह हिस्सा ही मेरा घर है।’
तसलीमा ने कहा कि वह ‘खुशी के साथ-साथ दर्द लेकर भी लौट रही हैं।’ उनके मुताबिक, कोलकाता ने उन्हें घर, दोस्त, पाठक और अपनापन दिया था, लेकिन बाद में उन्हें यह शहर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।
‘यह सिर्फ मेरी नहीं, एक आवाज की भी वापसी है’
तसलीमा नसरीन ने कहा कि उनकी यह वापसी केवल निजी नहीं है, बल्कि उस आवाज की वापसी का प्रतीक है जिसे धार्मिक कट्टरपंथियों ने कभी चुप कराने की कोशिश की थी। उन्होंने कार्यक्रम के आयोजकों और वर्तमान पश्चिम बंगाल सरकार का धन्यवाद भी किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने उनकी यात्रा आसान बनाई और सुरक्षा की व्यवस्था की। साथ ही उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार की विचारधारा चाहे जो हो, एक लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमेशा उसका मूल अधिकार रहना चाहिए।
तसलीमा को क्यों छोड़ना पड़ा था बांग्लादेश?
तसलीमा नसरीन को 1994 में अपने उपन्यास ‘लज्जा’ को लेकर जान से मारने की धमकियां मिलने के बाद बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। इसके बाद वह 2004 में पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में आकर रहने लगीं और इस शहर को अपनी सांस्कृतिक शरणस्थली माना। लेकिन नवंबर 2007 में उनकी आत्मकथा ‘द्विखंडित’ के कुछ हिस्सों को लेकर हिंसक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। इससे पहले 2003 में तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने इस किताब पर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग की भावनाएं आहत होने का हवाला देते हुए प्रतिबंध लगा दिया था।
कोलकाता से क्यों हुई तसलीमा की विदाई?
स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि कोलकाता के कुछ इलाकों में कानून-व्यवस्था संभालने के लिए सेना तैनात करनी पड़ी। इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने तसलीमा नसरीन से शहर छोड़ने को कहा। उन्हें पहले जयपुर और फिर दिल्ली भेजा गया। बाद में वह विदेश चली गईं। हालांकि, उन्होंने कई बार इच्छा जताई कि वह कम से कम साहित्यिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के लिए कोलकाता लौटना चाहती हैं। इसके बाद गभग 19 वर्षों तक उनकी वापसी नहीं हो सकी, जबकि समय-समय पर लेखकों, सामाजिक संगठनों और कुछ राजनीतिक नेताओं ने उनकी वापसी की मांग उठाई।
बीजेपी की सरकार आई और हो गई वापसी
पिछले साल यह मुद्दा फिर चर्चा में आया, जब बीजेपी के राज्यसभा सांसद और वर्तमान पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समीक भट्टाचार्य ने संसद में केंद्र सरकार से तसलीमा नसरीन की वापसी सुनिश्चित करने की मांग की थी। उन्होंने तसलीमा को इस्लामी कट्टरवाद के खिलाफ बेखौफ आवाज बताया था। बीजेपी का कहना है कि उनकी वापसी उन सरकारों की विफलता को सुधारने की दिशा में एक कदम है, जिन्होंने धार्मिक दबाव के सामने अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा नहीं की। वहीं, पूर्व वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस सरकारों का कहना रहा है कि 2007 में लिया गया फैसला बढ़ते सांप्रदायिक तनाव और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी था।
साहित्यिक कार्यक्रम में राजनीतिक संदेश भी
कार्यक्रम के आयोजकों का कहना है कि यह आयोजन तसलीमा नसरीन के जीवनभर धार्मिक कट्टरवाद के खिलाफ संघर्ष और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थन का सम्मान करने के लिए है, न कि किसी राजनीतिक मंच के रूप में। इसके बावजूद, करीब 19 साल बाद बदले हुए राजनीतिक माहौल में तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी को केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीति, धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े विमर्श का भी अहम प्रतीक माना जा रहा है। (PTI से इनपुट्स के साथ)
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