Adult Children Parenting Tips: बच्चों की चिंता में बार-बार न टोकें बच्चा कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, माता-पिता की नजर में उसकी चिंता कम नहीं होती. वह देर रात तक जागे, एक्सरसाइज न करे, जरूरत से ज्यादा पैसे खर्च करे या अपनी सेहत को नजरअंदाज करे, तो माता-पिता का मन तुरंत परेशान होने लगता है. ऐसे में अक्सर मुंह से निकल जाता है, “इतना खर्च मत करो”, “थोड़ा टहला करो” या “अपनी सेहत का ध्यान रखो,” लेकिन कई बार यही सलाह बड़े बच्चों को दखलअंदाजी लगने लगती है. बात बढ़ते-बढ़ते बहस और फिर गुस्से तक पहुंच जाती है.
खासकर बुजुर्ग माता-पिता के लिए यह स्थिति ज्यादा परेशान करने वाली हो सकती है. उन्हें लगता है कि वे तो बच्चे की भलाई के लिए कह रहे हैं, फिर बच्चा उनकी बात समझ क्यों नहीं रहा. काउंसलर और मेंटल हेल्थ एंड हैप्पीनेस कोच वीना सिन्हा ने ऐसे ही हालात को लेकर एक वीडियो में माता-पिता के लिए कुछ जरूरी बातें साझा की हैं. उनके मुताबिक, बड़े हो चुके बच्चों के साथ व्यवहार का तरीका थोड़ा बदलना चाहिए.
1. बड़े बच्चों की अपनी जिंदगी होती है
हर बात पर सलाह देना जरूरी नहीं एक्सपर्ट के मुताबिक, जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो उनके फैसले लेने की जिम्मेदारी भी उनकी होती है. माता-पिता का अनुभव उनके लिए मददगार हो सकता है, लेकिन हर फैसले पर निगरानी रखना रिश्ते में तनाव पैदा कर सकता है. मान लीजिए बेटा लगातार बाहर का खाना खा रहा है या बिल्कुल एक्सरसाइज नहीं करता. माता-पिता को उसकी सेहत की चिंता होना स्वाभाविक है, लेकिन रोज सुबह-शाम यही बात दोहराने से संभव है कि बच्चा सलाह को समझने के बजाय उसे दबाव के रूप में लेने लगे. ऐसे में सबसे बेहतर तरीका है कि अपनी चिंता साफ शब्दों में बताई जाए और फिर उसे फैसला लेने की थोड़ी जगह दी जाए.
पहला उपाय: अपनी बात कहें और हट जाएं
वीना सिन्हा के अनुसार, माता-पिता को सबसे पहले अपनी चिंता बच्चे के सामने शांत तरीके से रखनी चाहिए, अगर उन्हें लगता है कि बेटा जरूरत से ज्यादा खर्च कर रहा है या अपनी सेहत पर ध्यान नहीं दे रहा, तो वे अपना अनुभव साझा कर सकते हैं, लेकिन सलाह देने के बाद उसी बात पर बहस करते रहना जरूरी नहीं है. अपनी बात कहकर बातचीत को वहीं रोक देना ज्यादा समझदारी हो सकती है. इससे बच्चे को भी सोचने का समय मिलता है और माता-पिता अनावश्यक तनाव से बच जाते हैं.
बात मनवाने की कोशिश न करें
कई बार माता-पिता चाहते हैं कि बच्चा उनकी बात उसी समय मान ले. जब ऐसा नहीं होता, तो उन्हें लगता है कि बच्चा उनकी इज्जत नहीं करता. यहीं से बहस शुरू हो सकती है. बेहतर है कि सलाह को आदेश बनाने के बजाय अनुभव के रूप में रखा जाए.
दूसरा उपाय: गुस्से को दिल पर न लें
अगर बच्चा जवाब देते हुए तेज आवाज में बोलने लगे, तो तुरंत उसी अंदाज में प्रतिक्रिया देने से स्थिति बिगड़ सकती है. एक्सपर्ट की सलाह है कि उसकी बात सुनी जाए और यह समझने की कोशिश की जाए कि वह आखिर किस वजह से नाराज है. इसका मतलब यह नहीं कि गलत तरीके से बात करने को सही मान लिया जाए. बल्कि उस समय बहस बढ़ाने के बजाय थोड़ा शांत रहना जरूरी है. खासकर बुजुर्ग माता-पिता के लिए हर कठोर शब्द को मन में बैठा लेना मानसिक रूप से भारी पड़ सकता है.
तीसरा उपाय: अपनी जिंदगी और सेहत पर ध्यान दें
बच्चों की चिंता से ज्यादा जरूरी अपना सुकून एक्सपर्ट की तीसरी सलाह शायद सबसे ज्यादा काम की है. माता-पिता को अपनी पूरी ऊर्जा बच्चे की आदतें बदलने में लगाने के बजाय अपनी सेहत, खुशी और रोजमर्रा की जिंदगी पर भी ध्यान देना चाहिए. बच्चे को समझाने की कोशिश करने के बाद उसे अपने फैसले लेने दें. इस दौरान माता-पिता अपने दोस्तों से मिल सकते हैं, योग या टहलने जैसी गतिविधियों में समय दे सकते हैं, अपनी पसंद के काम कर सकते हैं या परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ वक्त बिता सकते हैं.









