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बेटे के जन्म पर एक पिता बहुत खुश होता है. क्योंकि आगे चलकर बेटा ही पिता की जिम्मेदारियां को संभालता है. बुढ़ापे का सहारा बनता है. लेकिन आज के समय में पिता और बेटे का रिश्ता समय के साथ मजबूत होने की जगह खोखला होता जा रहा है. बेटे बड़े होकर पिता को अपनी दुश्मन मान बैठते हैं. लेकिन ये याद रखना जरूरी है कि बुढ़ापा एक ऐसा मौसम है जिसका सामना सबको अपनी जिंदगी में कभी न कभी करना है.
यूपी के इटावा शहर से रिश्तों की एक ऐसी तस्वीर सामने आयी है, जो आपको ये सोचने पर मजबूर कर देगा कि क्या परिवार भी पराया हो सकता है? 72 साल के बुजुर्ग जो कभी करोड़पति थे, उनके मरने पर बेटों ने ही लावरिस छोड़ दिया. इतना ही नहीं जब प्रशासन ने परिवार को अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए मनाने की कोशिश की तब भी किसी ने आने की इच्छ नहीं जतायी. सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात है कि बुजुर्ग के परिवार में उनकी पत्नी, बेटी और बेटे हैं. लेकिन फिर भी अंतिम विदाई परायों ने दी.
जीवन भर इस शख्स ने अपने परिवार के लिए कितने ही बार अपनी खुशी और थकान को नजरअंदाज किया होगा. लेकिन जब आखिरी बार सबसे विदा लेने की बारी आयी तो परिवार ने ही मुंह मोड़ लिया.पिता और बच्चों का रिश्ता दुनिया के सबसे गहरे रिश्तों में से एक माना जाता है. यह रिश्ता किसी लेन-देन या शर्त पर आधारित नहीं होता. एक बाप अपने बच्चे को बिना किसी उम्मीद के प्यार करता है. वे उसकी हर सफलता पर खुश होता हैं और हर मुश्किल में उसके साथ खड़े रहता है. लेकिन जब उम्र बढ़ने लगती है, तब उन्हें भी उसी प्यार, सम्मान और साथ की जरूरत होती है.
आज के दौर में लोग अपने करियर, सामाजिक जीवन और व्यक्तिगत लक्ष्यों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि पिता के साथ समय बिताना भी मुश्किल लगने लगता है.घर में साथ रहते हुए भी रिश्तों में अपनापन कम होने लगता है. सबसे दुखद बात यह है कि कई लोग यह भूल जाते हैं कि बुढ़ापा जीवन का एक स्वाभाविक चरण है. जिस तरह आज उनके पिता को सहारे की जरूरत है, उसी तरह आने वाले समय में उन्हें भी अपने बच्चों के साथ और सहयोग की जरूरत पड़ सकती है. रिश्तों में जो व्यवहार हम आज करते हैं, वही आने वाली पीढ़ियां देखकर सीखती हैं.
यह भी सच है कि हर परिवार की परिस्थितियां अलग होती हैं. कई बार रिश्तों में मतभेद, विवाद या पुरानी परेशानियां भी होती हैं. लेकिन किसी भी स्थिति में मानवीय संवेदनाएं और सम्मान खत्म नहीं होने चाहिए. पिता के प्रति सम्मान केवल एक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य भी है. धन-दौलत, संपत्ति और सफलता जीवन को सुविधाजनक बना सकती हैं, लेकिन वे रिश्तों की गर्माहट की जगह नहीं ले सकतीं.
अंत में इंसान को याद रखा जाता है उसके व्यवहार, प्रेम और रिश्तों को निभाने के तरीके से. इसलिए पिता को समय देना, उनकी बात सुनना और उनका सम्मान करना केवल उनका हक नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी भी है. क्योंकि जीवन का चक्र सबके लिए एक जैसा है, और जिस राह पर आज वे चल रहे हैं, कल हमें भी उसी राह से गुजरना है.
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शारदा सिंह एक अनुभवी लाइफस्टाइल पत्रकार हैं, जिनके पास डिजिटल मीडिया और कंटेंट लेखन के क्षेत्र में 6 वर्षों से अधिक का अनुभव है. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से…
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New Delhi,Delhi
August 16, 2026, 12:48 IST








