विवेक शर्मा को आज के दौर का श्रवण कुमार कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा. सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट में 32 वर्षीय युवक की ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने रिश्तों और जिम्मेदारियों की अहमियत को नए नजरिए से समझाया है. आज की युवा पीढ़ी अपने सपनों, करियर और बड़ी सफलता के पीछे पूरी मेहनत से दौड़ रही है, लेकिन इस सफर में कई बार उस परिवार के त्याग और संघर्ष को भूल जाती है, जिसने उन सपनों को उड़ान देने के लिए अपनी खुशियां तक दांव पर लगा दीं. Facebook पर अनुराग शर्मा नाम के यूजर की ओर से शेयर की गई यह पोस्ट हजारों लोगों तक पहुंच चुकी है.
इस पोस्ट में एक बेटे की कहानी है, जिसने करोड़ों रुपये के पैकेज वाली नौकरी छोड़कर अपने बीमार माता-पिता का साथ चुना. वह अपनी जिंदगी के सबसे कठिन फैसले को याद करते हुए बताता है कि कैसे एक ऑफर लेटर आज भी उसकी अलमारी में रखा है, लेकिन वह अपने फैसले से बहुत खुश है. बस बात इतनी थी कि, वह पैसों के मोल से ज्यादा अपने मां-बाप की मोल समझ रहा था.
IIT तक का सफर आसान नहीं था
पोस्ट के मुताबिक, विवेक कानपुर के एक साधारण परिवार से आते हैं. पिता रेलवे में क्लर्क थे और मां ट्यूशन पढ़ाती थीं. आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, लेकिन माता-पिता ने बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी. दसवीं में 95 प्रतिशत और बारहवीं में 97 प्रतिशत अंक हासिल करने के बाद उन्होंने IIT की तैयारी की. कोचिंग की फीस जुटाने के लिए पिता ने अपना पीएफ निकाला, जबकि मां ने अपने गहने तक बेच दिए. मेहनत रंग लाई और 2012 में विवेक ने AIR 147 के साथ IIT बॉम्बे के कंप्यूटर साइंस विभाग में दाखिला हासिल किया. परिवार के लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा पल था. आगे चलकर कॉलेज में कोडिंग, हैकाथॉन और इंटर्नशिप के दौरान भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया. गूगल समर इंटर्नशिप के दौरान मिली पहली कमाई से उन्होंने पिता के लिए मोबाइल फोन और मां के लिए वॉशिंग मशीन खरीदी.
1.6 करोड़ का ऑफर, फिर…
फाइनल ईयर के प्लेसमेंट के दौरान सैन फ्रांसिस्को स्थित एक पेमेंट स्टार्टअप ने विवेक को सालाना 2,40,000 डॉलर का ऑफर दिया. उस समय यह 1.6 करोड़ था. परिवार अमेरिका जाने की तैयारियों में जुट गया था, लेकिन जॉइनिंग से पहले हालात अचानक बदल गए. पहले पिता को हार्ट और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर स्वास्थ्य समस्या के कारण अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जिसके इलाज में लाखों रुपये खर्च हुए. इसके कुछ ही समय बाद मां को स्टेज-2 ब्रेस्ट कैंसर होने का पता चला और कीमोथेरेपी व सर्जरी की जरूरत पड़ी. पोस्ट के अनुसार, एक तरफ विदेश में करियर का सुनहरा मौका था, तो दूसरी तरफ माता-पिता की बिगड़ती सेहत. यही वह मोड़ था, जहां विवेक को अपनी जिंदगी का सबसे कठिन फैसला लेना पड़ा.
पोस्ट के मुताबिक, विवेक के सामने एक तरफ विदेश की नौकरी थी और दूसरी तरफ बीमार माता-पिता. उन्होंने कंपनी से जॉइनिंग टालने और रिमोट काम करने का अनुरोध भी किया, लेकिन बात नहीं बनी. आखिरकार उन्होंने अपना वीजा इंटरव्यू रद्द कर दिया और कंपनी को ईमेल लिखकर ऑफर स्वीकार करने से इनकार कर दिया.
‘करियर फिर बन जाएगा, आप फिर नहीं मिलेंगे’
पोस्ट में एक भावुक प्रसंग का जिक्र है, जहां विवेक अपने पिता से कहते हैं कि करियर दोबारा बनाया जा सकता है, लेकिन माता-पिता दोबारा नहीं मिलेंगे. यही वह फैसला था जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी. इसके बाद उन्होंने कानपुर में ही नौकरी की, फिर घर के नीचे किराने की दुकान शुरू कर दी. साथ ही फ्रीलांस कोडिंग और बच्चों को प्रोग्रामिंग सिखाने का काम भी जारी रखा.
संघर्ष के बीच मिली नई राह
पोस्ट के अनुसार, समय के साथ मां की तबीयत सुधरी, पिता भी स्वस्थ होने लगे और दुकान धीरे-धीरे चल निकली. लॉकडाउन के दौरान होम डिलीवरी शुरू करने से कारोबार को भी फायदा हुआ. बाद में उन्होंने बच्चों के लिए कोडिंग क्लास शुरू की. उन्होंने बताया कि उनके एक छात्र ने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता जीती, जिसके बाद उनकी कहानी चर्चा में आई और उन्हें फिर से टेक सेक्टर के साथ काम करने का अवसर मिला.
लोगों को क्यों छू रही है यह कहानी?
Facebook पर इस पोस्ट पर बड़ी संख्या में लोग अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं. कई यूजर्स ने उनके इस फैसले की तारीफ करते हुए कहा कि- “बहुत खूब, हर माता-पिता को तुम्हारे जैसी औलाद मिले.” एक ने लिखा कि- “आपके माता-पिता ने बचपन से आपकी पढ़ाई में मेहनत करके आपको इस काबिल बनाया ओर आपने उनकी मेहनत को प्यार में बदल दिया आप के किए गए निवेश में माता-पिता के प्रति आदर सम्मान और प्यार भरा जीवन दिया. सच्ची दौलत माता-पिता की सेवा है. आपके ऊपर एक मूवी बननी चाहिए ताकि आज के युग के युवा अपने मां-बाप के त्याग को समझ सके.
सफलता की नई परिभाषा?
इस कहानी में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात उनका आखिरी संदेश है. पोस्ट के अनुसार, विवेक कहते हैं कि उन्हें अब अपने फैसले का पछतावा नहीं है. उनके लिए करियर सिर्फ बड़ी नौकरी नहीं, बल्कि अपने माता-पिता के साथ बिताया गया समय है और आज जब कोई बच्चा उनसे पूछता है कि भैया आप आईआईटी करके दुकान क्यों, वह कहते हैं कि- “मैं हंसता हूं और कहता हूं कि मेरे माता-पिता मेरी सबसे बड़ी कंपनी हैं, और मैं उनका फुल टाइम सीईओ हूं.”









