उज्जैन में पुल की टेस्टिंग की अनोखी टेक्निक, एक साथ 300 जवानों ने कूदकर किया टेस्ट; VIDEO हो रहा वायरल

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उज्जैन: शहर में स्थित महाकालेश्वर मंदिर परिसर में नागपंचमी की भीड़ को संभालने के लिए 91 फीट लंबे फुट ओवरब्रिज का लोड टेस्ट किया गया। इस दौरान 300 से अधिक सुरक्षा गार्ड्स ने एक साथ 10 मिनट तक पुल पर कूदकर और चलकर उसकी मजबूती की जांच की, जिसमें पुल पूरी तरह सुरक्षित पाया गया। इस टेस्टिंग का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में एक साथ 300 से अधिक जवानों को पुल पर कूदते हुए देखा जा सकता है।

नए पुल की हुई टेस्टिंग

दरअसल, यह पूरी टेस्टिंग नागपंचमी पर्व के लिए की गई थी। पिछले साल 5 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने इस ब्रिज से गुजर कर दर्शन किए थे। आज नागपंचमी पर्व पर रात 12 बजे नाग चंद्रेश्वर मन्दिर के पट खोले गए। इसके बाद लगातार दर्शन का सिलसिला जारी है। आज रात्रि 12 बजे तक दर्शन जारी रहेंगे। यहां बता दें कि नागचंद्रेश्वर मंदिर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के शीर्ष पर स्थित है। प्राचीन समय में मन्दिर के अंदर स्थित पत्थर की सीढ़ियों से चढ़कर नागचंद्रेश्वर मन्दिर दर्शन करने जाते थे। परंतु श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के कारण नया लोहे का ब्रिज बनाया गया।

बता दें कि, यह पुल 91 फीट लंबा और 10 फीट चौड़ा (5 फीट आने और 5 फीट जाने के लिए) है। यह महाकाल मन्दिर परिसर में स्थित विट्ठल पंढरीनाथ मंदिर क्षेत्र से नागचंद्रेश्वर मंदिर की छत तक जाता है। अधिकारियों ने एक बार में अधिकतम 300 श्रद्धालुओं के उपयोग की अनुमति की सिफारिश की है। फिसलन रोकने के लिए ब्रिज पर जूट मेटिंग बिछाने और सीसीटीवी व इमरजेंसी बटन लगाने के निर्देश दिए गए हैं।

साल में एक दिन खुलता है अलौकिक धाम

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल पर नागचंद्रेश्वर भगवान का पावन धाम स्थापित है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके कपाट वर्ष में केवल एक बार नागपंचमी के अवसर पर पूरे 24 घंटे के लिए खुलते हैं और इस दौरान भारी संख्या में श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए खुलते हैं। इस दिन के अलावा पूरे साल मंदिर में दर्शन नहीं किए जा सकते हैं।

दुर्लभ प्रतिमा का रहस्य

मंदिर के गर्भगृह में स्थापित 11वीं शताब्दी की यह प्रतिमा कला और आस्था का अद्भुत संगम है। यहां देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती 10 से 11 फनों वाले विशाल शेषनाग के छत्र तले विराजमान हैं। इस मनमोहक स्वरूप में प्रथम पूज्य भगवान गणेश भी उनके साथ दिखाई देते हैं। माना जाता है कि संपूर्ण विश्व में भगवान शिव का ऐसा अनूठा स्वरूप कहीं देखने को नहीं मिलता।

इतिहास और पौराणिक पृष्ठभूमि

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार इस अद्वितीय मूर्ति की स्थापना लगभग 1050 ईस्वी में परमार वंश के प्रतापी राजा भोज के शासनकाल के दौरान हुई थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नागों के राजा तक्षका ने भगवान भोलेनाथ की कठोर तपस्या इसी स्थान पर की थी। (इनपुट- प्रेम डोडिया)

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