जब अपने भी रिश्ते से मुंह मोड़ ले तो भीड़ में भी तन्हा हो जाता है इंसान, फिर क्या है इस गहरी तन्हाई से बाहर निकलने का रास्ता

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how to deal with loneliness : आसपास हजारों की भीड़ लेकिन उस भीड़ में तन्हा, अकेलापन. क्या आपके साथ ऐसा महसूस हुआ है. 21वीं सदी में ऐसा अब बचपन गुजरने के साथ ही शुरू होने लगा है. अधिकांश ऐसे लोग हैं जिनके सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स हैं लेकिन वे अकेलापन महसूस करने लगे हैं. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है यह अकेलापन और भयावह होने लगता है. अगर रिश्ता अपनों के साथ टूट जाए या सब मुंह मोड़ ले तो जीवन और भी कठिन हो जाता है. आखिर इस अकेलेपन से कैसे निकलें.

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अकेलेपन से बचने के उपाय

चीन में हालिया एक घटना ने रिश्तों की बुनियाद पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया है. एक 78 वर्षीय बुजुर्ग एक मार्केट के सामने रोज एक चटाई पर लेटा रहता था. लोगों को लगा कि वह भिखारी होगा. महीनों तक वह उसी अवस्था में रहा. उनके बाल और दाढ़ी घने हो गए. उनकी सेहत गिरने लगी और वे वास्तव में लावारिस की तरह बेढब दिखने लगा. इसी क्रम में एक घरेलू काम में मदद करने वाली एक लड़की भी उन्हें रोज देखती थी. वह गरीब थी और पेट पालने के लिए कुछ घरों में जाकर लोगों की सेवा करती थीं. एक दिन उससे रहा नहीं गया और वह उस बुजुर्ग को नहला-धोकर अच्छे से साफ कर दिया. फिर रोज उन्हें खाना खिलाने लगी. धीरे-धीरे बुजुर्ग हेल्दी हो गए और उस लड़की को अपनी बेटी कहने लगा. एक दिन अचानक उस लड़की के नाम से अपना सारा कुछ कर दिया. जब यह सामने आई तो पूरा देश अवाक रह गया. वास्तव में वह बुजुर्ग कोई भिखारी नहीं था बल्कि उसके पास करोड़ों का फ्लैट था. वह फ्लैट उसने उस लड़की के नाम कर दिया तो दौड़ा-दौड़ा उसका बेटा आ गया और उसपर मुकदमा कर दिया. बुजुर्ग की कहानी बड़ी मार्मिक है. पहले पत्नी के साथ तालाक हुआ फिर बेटों ने उनसे मुंह फेर लिया. जब वह बुजुर्ग घर में अकेले बिताने लगा तो वह भारी निराशा में चला गया. उसे अकेलेपन सताने लगा और कहीं अकेले वह फ्लैट में मर न जाए इसलिए वह सुपर मार्केट के सामने सोने लगा. यह मार्मिक कहानी हमें बताती है कि आज की दुनिया में बुजुर्गों को कितना अकेलेपन से गुजरना पड़ता है.

बुजुर्गो में अलगाव की भावना क्यों
आज भागती दौड़ती जिंदगी है. जब बेटे या बेटियां बड़ी हो जाती हैं तो सब अपने-अपने कामों में लगे होते हैं. मां-बाप के लिए कोई समय नहीं निकाल पाता. बेटे के बच्चों सबके पास तो और भी समय नहीं हो पाता. आजकल पढ़ाई के नाम पर पूरा दिन उसी में बच्चे लगे रहते है. पहले घंटों स्कूल और फिर स्कूल का टास्क फिर ऑनलाइन क्लासेज, फिर कोचिंग आदि. फिर जो भी थोड़ा समय बचता, उसमें बच्चे टीवी,मोबाइल या गैजेट्स देखने में मशगूल हो जाते है. पहले के जमाने में अक्सर पोता-पोती दादा-दादी के करीब होते थे लेकिन आजकल ऐसा नहीं है. इस परिस्थिति में सब कुछ होते हुए भी बुजुर्ग अकेले रहने लगे है. इस अकेलेपन में घोर निराश उसके जीवन में आने लगती है. इस निराशा से कुंठा होती है और यह कुंठा अवसाद में बदल जाता है. आखिर ऐसा कौन सा उपाय है जिससे कोई बुजुर्ग खुद को अलगाव महसूस न करें.

क्या करें बुजुर्ग

  • सोशल नेटवर्किंग का सहारा- अक्सर बुजुर्ग इसलिए अकेले पड़ जाते हैं क्योंकि वे नई पीढ़ी की भाषा और माध्यमों (गैजेट्स) से नहीं जुड़ पाते. इसके लिए स्मार्टफोन को केवल फोन उठाने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया से जुड़ने के लिए इस्तेमाल करें. यूट्यूब पर अपनी पसंद के पुराने गाने, आध्यात्मिक प्रवचन या नई रेसिपी देखें. जब आप तकनीक में सक्षम होते हैं, तो पोता-पोती भी आपके पास कुछ नया सीखने या दिखाने आने लगते हैं. यह डिजिटल विंडो आपको घर के कोने से निकालकर पूरी दुनिया से जोड़ देती है.
  • हमउम्र सोशल सर्कल का निर्माण- परिवार से संवाद की उम्मीद जब टूटने लगे तो बाहर के समाज की ओर मुड़ना जरूरी है. सुबह या शाम को पार्क में टहलने जाएं. वहां अपने जैसा हंसमुख हमउम्र लोगों से जान-पहचान बढ़ाएं, उनसे दोस्ती करें, समाज के दोस्तों के साथ जितना घुलेंगे मिलेंगे उतना अपनापन महसूस होगा फिर घर के लोग भी अच्छे लगने लगेंगे. जो दुख आप अपने व्यस्त बच्चों से नहीं कह पाते, वह आपके हमउम्र दोस्त बिना कहे समझ जाते हैं. एक हमउम्र मित्र की सहानुभूति जीवनसाथी के अभाव को कुछ हद तक भरने में सक्षम होती है.
  • क्रिएटिविटी- खाली दिमाग उदासी का घर होता है. जब कोई बात करने वाला न हो, तो कागज और कलम को अपना दोस्त बनाएं. अपनी यादें लिखना शुरू करें. आप जानते हैं कि शब्दों में कितनी शक्ति होती है. घर के पुराने एल्बम सहेजें, बागवानी करें या कोई भूला हुआ शौक फिर से शुरू करें.जितनी भी क्रिएटिविटी कर सकते हैं, सब करना शुरू कर दें. जब आप किसी सृजन में व्यस्त होते हैं, तो अकेलेपन और एकांतके बीच का अंतर समझ आने लगता है. एकांत आपको भीतर से समृद्ध करता है.
  • सेहत-अपनी सेहत पर ध्यान दें. इस उम्र में तनाव सबसे बड़ा दुश्मन है. अपनी सेहत को संवारने के लिए डॉक्टरों का सहारा लें. डॉक्टरों के हिसाब से काम करें. अच्छी डाइट लें. बाहर के अनाप-सनाप चीजों से बचें. रोज योग, प्राणायाम और पौष्टिक आहार को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं. अपने छोटे-मोटे काम खुद करने की कोशिश करें. जब आप शारीरिक रूप से सक्रिय और आत्मनिर्भर महसूस करते हैं, तो आत्मसम्मान बढ़ता है. एक स्वस्थ बुजुर्ग घर के कोने में पड़ा हुआ महसूस नहीं करता, बल्कि घर की ऊर्जा बन जाता है.
  • आध्यात्मिक और सामाजिक सेवा से जुड़ाव –स्वयं से ध्यान हटाकर दूसरों की मदद में लगाना अवसाद की सबसे बड़ी दवा है. पास के किसी मंदिर, एनजीओ या पुस्तकालय में अपनी सेवाएं दें. यदि आप शिक्षित हैं, तो आसपास के गरीब बच्चों को पढ़ा सकते हैं. दूसरों के जीवन में मूल्य जोड़ने से जो उद्देश्यमिलता है, वह अकेलेपन के हर घाव को भर देता है. यह अहसास कि दुनिया को मेरी जरूरत है, निराशा को जड़ से खत्म कर देता है.

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Lakshmi Narayan

18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …

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