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Supreme Court on Paternity Leave India : सुप्रीम कोर्ट का यह नजरिया भारतीय परिवारों में एक नई क्रांति ला सकता है. ‘पितृत्व अवकाश’ को बोझ या काम से भागने का जरिया नहीं, बल्कि एक स्वस्थ समाज और मजबूत परिवारों के निर्माण की सीढ़ी माना जाना चाहिए. जब पिता और बच्चे का रिश्ता शुरुआती दिनों से ही मजबूत होगा, तभी हम एक बेहतर और अधिक संवेदनशील भविष्य की कल्पना कर सकते हैं.
जब पति पेटर्निटी लीव लेकर घर की जिम्मेदारियां साझा करता है, तो इससे पति-पत्नी के आपसी रिश्ते में सम्मान और प्यार बढ़ता है.
Father and child bonding importance : अक्सर हमारे समाज में माना जाता है कि जन्म के शुरुआती हफ्तों में बच्चे को सिर्फ मां की ज़रूरत होती है, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने ‘पेटर्निटी लीव’ (पितृत्व अवकाश) पर सुनवाई के दौरान एक ऐसी दलील दी है, जिसने इस पुरानी सोच को चुनौती दी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पेटर्निटी लीव सिर्फ एक ‘छुट्टी’ नहीं है, बल्कि यह पिता और बच्चे के बीच ताउम्र रहने वाले रिलेशनशिप की नींव है.
अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि बच्चे का पालन-पोषण केवल एक माता या पिता का काम नहीं, बल्कि यह एक साझा जिम्मेदारी (Shared Responsibility) है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को विशुद्ध रूप से प्रशासनिक नजरिए से देखने के बजाय ‘रिश्तों के एंगल’ से देखा है.
रिलेशनशिप के नजरिए से 3 बड़ी दलीलें:
- इमोशनल एंकरिंग (Emotional Anchoring):
बच्चा सिर्फ मां का नहीं, दोनों का साझा हिस्सा है. शुरुआती दिनों में पिता की सक्रिय भागीदारी से बच्चे के मन में पिता के प्रति एक गहरा विश्वास और लगाव पैदा होता है, जो भविष्य में उनके बीच के कम्युनिकेशन को बेहतर बनाता है. - जेंडर न्यूट्रल पेरेंटिंग:
कोर्ट की टिप्पणियां इस ओर इशारा करती हैं कि अब वह समय चला गया जब घर के बाहर का काम पिता और घर के अंदर का काम मां का होता था. पेटर्निटी लीव पुरुषों को यह एहसास दिलाती है कि वे भी ‘प्राइमरी केयरगिवर’ (मुख्य देखभाल करने वाले) हैं. - मां के साथ रिश्ते में मजबूती:
प्रसव के बाद एक महिला शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद संवेदनशील दौर से गुजरती है. जब पति पेटर्निटी लीव लेकर घर की जिम्मेदारियां साझा करता है, तो इससे पति-पत्नी के आपसी रिश्ते में सम्मान और प्यार बढ़ता है, जिसका सीधा असर बच्चे के खुशनुमा माहौल पर पड़ता है.
वैज्ञानिक शोध भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि जिन बच्चों को शुरुआत से ही पिता का साथ मिलता है, वे सामाजिक रूप से अधिक सक्रिय और आत्मविश्वासी होते हैं.
सुप्रीम कोर्ट की दलील इसी मनोवैज्ञानिक सत्य को कानूनी मजबूती प्रदान करती है. पिता के साथ बिताया गया यह समय बच्चे के संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) में भी मदद करता है.
भारत में क्या है वर्तमान स्थिति?
फिलहाल, भारत में केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों को 15 दिनों की पेटर्निटी लीव का प्रावधान है. हालांकि, प्राइवेट सेक्टर में यह पूरी तरह से कंपनी की नीतियों पर निर्भर करता है. सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस का मुख्य उद्देश्य इसे एक समान अधिकार बनाना है ताकि हर पिता अपने बच्चे के शुरुआती जीवन का हिस्सा बन सके.
सुप्रीम कोर्ट का यह नजरिया भारतीय परिवारों में एक नई क्रांति ला सकता है. ‘पितृत्व अवकाश’ को बोझ या काम से भागने का जरिया नहीं, बल्कि एक स्वस्थ समाज और मजबूत परिवारों के निर्माण की सीढ़ी माना जाना चाहिए. जब पिता और बच्चे का रिश्ता शुरुआती दिनों से ही मजबूत होगा, तभी हम एक बेहतर और अधिक संवेदनशील भविष्य की कल्पना कर सकते हैं.
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मैंने लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर वूमन से अपनी ग्रेजुएशन और मिरांडा हाउस से मास्टर्स की डिग्री पूरी की है. पत्रकारिता करियर की शुरुआत दूरदर्शन(2009) से की, जिसके बाद दैनिक भास्कर सहित कई प्रमुख अख़बारों में मेनस्ट्र…
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March 18, 2026, 14:33 IST








