शादी के 7 महीने बाद पत्नी की मौत, दहेज हत्या केस में पति और सास-ससुर बरी, कोर्ट ने कहा- आरोप साबित नहीं

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दिल्ली की एक अदालत ने 2016 के दहेज हत्या मामले में एक व्यक्ति और उसके माता-पिता को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पूजा तलवार ने रोहित कुमार, उसकी मां सुनीता और पिता विजय कुमार को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि मृतका को दहेज की मांग को लेकर क्रूरता या प्रताड़ना का सामना करना पड़ा था। जानिए क्या है पूरा मामला। 

कोर्ट ने तीनों को किया बरी

दिल्ली की एक अदालत ने रोहित कुमार और उसके माता-पिता सुनीता और विजय कुमार को ललिता की 2016 में हुई मौत के मामले में बरी किया। ललिता ने शादी के 7 महीने के अंदर आत्महत्या कर ली थी। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों का अपराध उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

करीब एक महीने से मायके में थी ललिता

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन की कहानी के मुताबिक ललिता 24 सितंबर 2016 से अपने ससुराल से बाहर थी और 17 अक्टूबर 2016 को उसने आत्महत्या कर ली। इस बीच करीब एक महीने तक उसका अपने पति या ससुराल वालों से कोई संपर्क नहीं था। कोर्ट ने कहा कि आत्महत्या से पहले वह इतने लंबे समय तक आरोपियों के प्रभाव में नहीं थी। अभियोजन के मुताबिक ललिता की शादी रोहित से 11 मार्च 2016 को हुई थी। उसके पिता ने आरोप लगाया था कि शादी से पहले परिवार की ओर से होंडा सिटी कार और सोने की अंगूठी की मांग की गई थी। इसके बाद भी कथित तौर पर दहेज की अतिरिक्त मांगें की गईं।

मायके में की आत्महत्या

ललिता 24 सितंबर 2016 को अपने मायके लौट आई थी। इसके बाद 17 अक्टूबर 2016 को उसने पंखे से लटककर आत्महत्या कर ली। उसके कपड़ों से एक सुसाइड नोट बरामद किया गया था। इसके अलावा उसके मोबाइल फोन को भी जब्त किया गया था, जिसमें वॉइस रिकॉर्डिंग थी।

परिजनों ने आरोपों का समर्थन नहीं किया

मामले की सुनवाई के दौरान मृतका के माता-पिता और बहन ने दहेज प्रताड़ना और क्रूरता से जुड़े अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं किया। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि ललिता के पिता ने कहा था कि मृतका ने कभी उनसे दहेज की मांग को लेकर शिकायत नहीं की थी।

पति से मतभेद की बात

ललिता के पिता ने यह संभावना भी जताई थी कि वह अपने पति के साथ मतभेद के कारण मायके लौटी हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा था कि पिछली शादी टूटने के बाद ललिता अवसाद में हो सकती थी।

संपर्क नहीं होने पर कोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने कहा कि ललिता की मौत से करीब एक महीने पहले ही वह ससुराल छोड़ चुकी थी और आत्महत्या तक आरोपियों के साथ उसका कोई संवाद नहीं हुआ था। कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में, जब दोनों पक्षों के बीच सीधा संपर्क ही नहीं था, आरोपियों के प्रभाव या उकसावे की बात दूर की संभावना लगती है। अदालत ने अंत में कहा कि अभियोजन पक्ष रोहित, सुनीता और विजय के खिलाफ आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। इसके बाद कोर्ट ने तीनों को उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों से बरी कर दिया।

(इनपुट- पीटीआई)

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Author: Kaushal kumar

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