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Impact of Census on Traditional Marriage : लोग पूछ रहे हैं कि क्या अब ‘सात फेरों’ की अहमियत पर इसका असर पड़ेगा? क्या सिर्फ साथ रहने भर से कोई जोड़ा आधिकारिक तौर पर शादीशुदा जैसा मान लिया जाएगा? जनगणना में लिव-इन कपल्स को पति-पत्नी जैसा दर्जा देने का मतलब यह कतई नहीं है कि कानूनी रूप से उनकी शादी हो गई है, लेकिन सरकारी आंकड़ों में उन्हें एक ‘यूनिट’ मानना एक बड़ी सांकेतिक जीत कही जा सकती है.
जनगणना में इस कॉलम के शामिल होने से उन्हें एक आधिकारिक पहचान मिलेगी.
Live-in Couples in Census : भारत में होने वाली अगली जनगणना में ‘लिव-इन’ कपल्स के लिए अलग कॉलम की खबर ने एक नई बहस छेड़ दी है. आम बोलचाल की भाषा में कहें तो अब तक जो रिश्ते समाज की नजरों से छिपकर चलते थे, उन्हें पहली बार सरकारी कागजों में ‘पति-पत्नी’ जैसी पहचान मिलने जा रही है. लोग पूछ रहे हैं कि क्या अब ‘सात फेरों’ की अहमियत पर इसका असर पड़ेगा? क्या सिर्फ साथ रहने भर से कोई जोड़ा आधिकारिक तौर पर शादीशुदा जैसा मान लिया जाएगा? यह सवाल आज हर उस भारतीय परिवार के मन में है जो संस्कारों को सर्वोपरि मानता है.
भारतीय समाज में शादी सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार है जिसे ‘सात फेरों’ और ‘अग्नि’ की साक्षी में पूरा किया जाता है. जनगणना में लिव-इन कपल्स को पति-पत्नी जैसा दर्जा देने का मतलब यह कतई नहीं है कि कानूनी रूप से उनकी शादी हो गई है, लेकिन सरकारी आंकड़ों में उन्हें एक ‘यूनिट’ मानना एक बड़ी सांकेतिक जीत है.
आलोचकों का तर्क है कि जब बिना किसी सामाजिक और धार्मिक जिम्मेदारी के ‘पति-पत्नी’ का लेबल मिल जाएगा, तो युवा शादी की जटिलताओं और जिम्मेदारियों से बचने लगेंगे. क्या इससे हमारी सदियों पुरानी विवाह संस्था कमजोर होगी? यह एक बड़ा सवाल है.
क्या बदल जाएगी समाज की सोच(Social Acceptance of Live-in in India)?
अब तक लिव-इन में रहने वाले कपल्स को समाज में ‘किराए का मकान’ मिलने से लेकर ‘पड़ोसियों के तानों’ तक, बहुत कुछ सहना पड़ता था. जनगणना में इस कॉलम के शामिल होने से उन्हें एक आधिकारिक पहचान मिलेगी.
खुलकर सामने आएंगे लोग: जनगणना में जानकारी दर्ज होने के बाद ऐसे रिश्तों में रहने वाले लोग खुद को समाज की मुख्यधारा का हिस्सा महसूस करेंगे.
सुरक्षा का अहसास: खासकर महिलाओं के लिए, सरकारी रिकॉर्ड में रिश्ते का दर्ज होना एक तरह की सुरक्षा और पहचान का अहसास कराता है.
परिवार व्यवस्था के लिए ‘खतरा’ क्यों?
पारंपरिक सोच रखने वाले लोगों और समाजशास्त्रियों का एक वर्ग इसे ‘भारतीय परिवार ढांचे’ (Indian Family Structure) के लिए खतरा मान रहा है. इसके पीछे तीन मुख्य डर हैं:
- प्रतिबद्धता (Commitment) की कमी: लिव-इन को आसानी से खत्म किया जा सकता है. लोगों को डर है कि इससे ‘ब्रेकअप’ की संस्कृति बढ़ेगी और परिवार जैसी स्थायी संस्था बिखर जाएगी.
- संस्कारों की कमी: शादी में परिवार और समाज की जो भागीदारी होती है, वह लिव-इन में नदारद रहती है. इसे पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण माना जा रहा है.
- कानूनी पेचीदगियां: भविष्य में उत्तराधिकार, बच्चों की कस्टडी और संपत्ति के विवादों को लेकर भी चिंताएं जताई जा रही हैं.
एक बड़ा बदलाव या केवल डेटा कलेक्शन?
सरकारी नजरिए से देखें तो यह केवल एक डेटा कलेक्शन की प्रक्रिया है. सरकार को यह जानना जरूरी है कि देश में कितने लोग किस तरह के घरेलू परिवेश में रह रहे हैं. लेकिन समाज के लिए यह ‘डेटा’ से कहीं बढ़कर ‘दर्जा’ (Status) है.
तो क्या यह फैसला लिव-इन को एक ‘टैबू’ (Taboo) से निकालकर एक ‘नॉर्मल’ रिश्ते में बदल देगा? या फिर यह पारंपरिक विवाहों की चमक को फीका कर देगा? इसका जवाब तो आने वाला समय ही देगा, लेकिन इतना तय है कि जनगणना 2026 के इस एक कॉलम ने भारत के सामाजिक ताने-बाने को झकझोर कर रख दिया है.
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मैंने लेडी श्रीराम कॉलेज फॉर वूमन से अपनी ग्रेजुएशन और मिरांडा हाउस से मास्टर्स की डिग्री पूरी की है. पत्रकारिता करियर की शुरुआत दूरदर्शन(2009) से की, जिसके बाद दैनिक भास्कर सहित कई प्रमुख अख़बारों में मेनस्ट्र…
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March 31, 2026, 13:30 IST








