Highlights
- शी का मिस्र दौरा मिडिल ईस्ट में चीन के बढ़ते रणनीतिक प्रभाव की बड़ी तस्वीर दिखाता है।
- स्वेज नहर और ईरान के कारण मिस्र अब चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा में बेहद अहम है।
- चीन की बढ़ती मौजूदगी से वैश्विक शक्ति संतुलन बहुध्रुवीय दिशा में आगे बढ़ सकता है।
काहिरा: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस हफ्ते मिस्र के दौरे पर हैं। ऊपर से देखें तो यह चीन और मिस्र के बीच आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करने का एक सामान्य दौरा लगता है। लेकिन इसके पीछे कहानी कहीं बड़ी है। अमेरिका के सबसे बड़े वैश्विक प्रतिद्वंद्वी चीन का रिश्ता अब अमेरिका के एक बेहद अहम मिडिल ईस्ट सहयोगी मिस्र के साथ तेजी से मजबूत हो रहा है। चीन ऐसे समय में मध्य पूर्व में अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जब इस इलाके का गणित बदल रहा है।
मिडल ईस्ट का दोस्त दिखना चाहता है चीन
दरअसल, शी की कोशिश है कि चीन को एक ऐसे देश के रूप में पेश किया जाए जो मिडिल ईस्ट में स्थिरता और शांति ला सकता है, जबकि अमेरिका दशकों से इस क्षेत्र में सैन्य रूप से उलझा रहा है। ईरान के साथ अमेरिका का छह महीने चला युद्ध इसका सबसे ताजा उदाहरण है। वॉशिंगटन स्थित कार्नेगी मिडिल ईस्ट प्रोग्राम के निदेशक अमर हमजावी ने इस साल एक पेपर में कैथरीन सेल्फ के साथ लिखा था,
‘चीन लगातार अपनी सॉफ्ट पावर यानी बिना सैन्य ताकत के प्रभाव बढ़ा रहा है, जबकि अमेरिका खुद अपनी सॉफ्ट पावर को नुकसान पहुंचा रहा है।’
शी जिनपिंग के मिस्र दौरे में क्या खास है?
शी मंगलवार शाम मिस्र की राजधानी काहिरा पहुंचे। एयरपोर्ट को चीनी और मिस्र के झंडों से सजाया गया था। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी और सैन्य गार्डों ने रेड कार्पेट समारोह में उनका स्वागत किया। दोनों नेता बुधवार को बातचीत करने वाले हैं। शी गीजा के पिरामिडों के पास बने ग्रैंड इजिप्शियन म्यूजियम भी जाएंगे। शी मिस्र में तीन दिन रहेंगे। यह 10 साल में उनकी पहली मिस्र यात्रा है और 2022 में सऊदी अरब जाने के बाद मिडिल ईस्ट का उनका पहला दौरा है। दूसरी ओर, सीसी पिछले कुछ वर्षों में कई बार चीन जा चुके हैं।
मिस्र के लिए चीन क्यों जरूरी हो रहा है?
मिस्र चीन के साथ बढ़ते रिश्तों को अपनी रणनीतिक साझेदारियों में विविधता लाने के तरीके के रूप में देखता है। यानी काहिरा केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहता और चीन के साथ भी मजबूत संबंध बनाना चाहता है। 2023 में मिस्र को BRICS में शामिल होने का न्योता मिला। इस ग्रुप में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे बड़े उभरते देश शामिल हैं। इसे पश्चिमी नेतृत्व वाले G7 जैसे संस्थानों के संभावित संतुलन के रूप में देखा जाता है। इसके एक साल बाद मिस्र और चीन ने बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव यानी कि BRI के तहत सहयोग के समझौते किए।

Image Source : APशी जिनपिंग और अब्देल फतह अल-सीसी।
बता दें कि BRI शी जिनपिंग की प्रमुख वैश्विक योजना है, जिसके तहत चीन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सड़क, रेल, ऊर्जा और दूसरी बुनियादी परियोजनाओं में निवेश करता है। चीन अब तक मिस्र में 10 अरब डॉलर से ज्यादा का निवेश कर चुका है। इसमें काहिरा के पूर्व में एक बिजनेस हब और नील डेल्टा में उद्योगों के लिए इलेक्ट्रिक रेल लाइन जैसी परियोजनाएं शामिल हैं। दोनों देशों के बीच सालाना व्यापार करीब 20 अरब डॉलर का है। इसके मुकाबले 2025 में अमेरिका और मिस्र के बीच व्यापार 15.7 अरब डॉलर रहा। इसके बावजूद मिस्र अमेरिकी सुरक्षा रणनीति के लिए बेहद अहम साझेदार है और दोनों देशों के नेताओं के बीच करीबी संबंध हैं।
पूरे मिडिल ईस्ट से रिश्ते बढ़ा रहा है चीन
चीन की रणनीति सिर्फ मिस्र तक सीमित नहीं है। बीजिंग पिछले कुछ वर्षों से मिडिल ईस्ट के अलग-अलग देशों के बीच पुल बनाने की कोशिश करता रहा है। 2023 में चीन ने ईरान और सऊदी अरब के बीच राजनयिक रिश्ते दोबारा स्थापित कराने में मध्यस्थता की थी। ईरान चीन का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सहयोगी और तेल सप्लायर है, जबकि सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका का प्रमुख सहयोगी रहा है। उस समझौते ने दुनिया को यह संकेत दिया कि चीन मिडिल ईस्ट में प्रभाव के मामले में अमेरिका को चुनौती देने की क्षमता दिखाना चाहता है।
Image Source : APमिस्र तो चीन इतनी तवज्जो बेवजह नहीं दे रहा है।
हालांकि, इसके बाद सऊदी अरब और ईरान के रिश्ते फिर तनावपूर्ण हुए। ईरान ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के तहत सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देशों को भी निशाना बनाया। अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था।
फिलिस्तीन मुद्दे पर भी जगह बना रहा चीन
चीन लंबे समय से इजरायल-फिलिस्तीन विवाद के दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता रहा है। अरब देशों में इसे मिडिल ईस्ट की स्थिरता के लिए बेहद जरूरी माना जाता है। 2023 में हमास के इजरायल पर हमले और गाजा युद्ध शुरू होने से कुछ समय पहले शी जिनपिंग ने फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास की मेजबानी की थी और फिलिस्तीनी अथॉरिटी के साथ ‘रणनीतिक साझेदारी’ का ऐलान किया था। इस तरह चीन खुद को सिर्फ आर्थिक ताकत नहीं, बल्कि मिडिल ईस्ट के विवादों में एक संभावित मध्यस्थ के रूप में भी पेश कर रहा है।
स्वेज नहर ने मिस्र की अहमियत और बढ़ा दी
शी की मिस्र यात्रा का एक बड़ा रणनीतिक पहलू स्वेज नहर भी है। ईरान युद्ध के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। ऐसे में मिस्र के नियंत्रण वाली स्वेज नहर क्षेत्र से ऊर्जा की आपूर्ति बाहर ले जाने के लिए एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक रास्ता बन गई है। जकार्ता के ‘सेंटर ऑफ इकोनॉमिक एंड लॉ स्टडीज’ के मिडिल ईस्ट एक्सपर्ट मुहम्मद जुल्फिकार रहमत ने कहा,
‘चीन के पास उस देश के साथ रिश्ते मजबूत करने की अच्छी वजह है, जिसके नियंत्रण में अभी भी खुला हुआ यह रास्ता है।’
रहमत ने कहा कि शी मिस्र को ‘व्यापक अरब और अफ्रीकी दुनिया तक पहुंचने के एक आधार’ के रूप में देखते हैं। उनके मुताबिक, ऐसा ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका के पास इस इलाके पर ध्यान देने के लिए पहले की तुलना में कम समय है। खास बात यह है कि चीन और मिस्र सैन्य स्तर पर भी करीब आ रहे हैं और दोनों ने हाल ही में कई दिनों तक हवाई सैन्य अभ्यास भी किया था।
ईरान से काफी बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है चीन
मिस्र आने से पहले शी जिनपिंग ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की दो दिवसीय बैठक में हिस्सा लिया। यह 10 देशों का राजनीतिक और सुरक्षा संगठन है, जिसे अमेरिकी वैश्विक प्रभाव के संभावित संतुलन के तौर पर देखा जाता है। किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में हुई इस बैठक में रूस, भारत, पाकिस्तान और ईरान के नेताओं ने भी हिस्सा लिया। इसके अलावा, शी का मिस्र दौरा ऐसे समय हो रहा है जब ट्रंप प्रशासन ने ईरान के वित्तीय संबंधों पर ‘आर्थिक हमला’ तेज किया है।
Image Source : APडोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग।
बता दें कि अमेरिकी प्रतिबंधों का मकसद ईरान को उसके बचे हुए आर्थिक साझेदारों से भी अलग करना है। लेकिन यहां चीन अमेरिका की रणनीति के लिए बड़ी चुनौती बनता है। चीन ईरान से काफी बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है और ईरान के तेल निर्यात का 80% से ज्यादा हिस्सा चीन जाता है, आमतौर पर अप्रत्यक्ष माध्यमों से। बीजिंग का कहना है कि ईरान के साथ उसका व्यापार हमेशा अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक रहा है।
अमेरिका और वर्ल्ड ऑर्डर पर क्या असर पड़ेगा?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा मतलब यह है कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका का अकेला सबसे प्रभावशाली बाहरी शक्ति बने रहना अब पहले जितना आसान नहीं है। अमेरिका के पास अब भी मजबूत सैन्य मौजूदगी, पुराने गठबंधन और मिस्र, सऊदी अरब तथा इजरायल जैसे महत्वपूर्ण साझेदार हैं। लेकिन चीन पैसा, व्यापार, बुनियादी ढांचे, कूटनीति और अब धीरे-धीरे सैन्य सहयोग के जरिए अपनी अलग जगह बना रहा है। इसका असर वर्ल्ड ऑर्डर यानी दुनिया में शक्ति के संतुलन पर भी पड़ सकता है।
Image Source : APअमेरिका के लिए खतरे की घंटी क्यों है चीन का बढ़ता प्रभाव।
अगर मिडिल ईस्ट के देश अमेरिका के साथ-साथ चीन से भी मजबूत रिश्ते बनाने लगते हैं, तो दुनिया 2 ध्रुवों में बंटने के बजाय कई ताकतों वाले बहुध्रुवीय सिस्टम की तरफ बढ़ सकती है। चीन के लिए मिस्र खास है क्योंकि वह सिर्फ अरब दुनिया का बड़ा देश नहीं है, बल्कि अफ्रीका और यूरोप के बीच रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण जगह पर स्थित है और स्वेज नहर को नियंत्रित करता है। इसलिए मिस्र के साथ मजबूत रिश्ता चीन को व्यापार, ऊर्जा, समुद्री रास्तों और कूटनीति, इन चारों मोर्चों पर फायदा दे सकता है।
क्या अमेरिका को इससे परेशान होना चाहिए?
अमेरिका के लिए चिंता की बात यह है कि चीन अब उसके पारंपरिक प्रभाव वाले क्षेत्र में आर्थिक निवेश से आगे बढ़कर कूटनीतिक और सैन्य साझेदारी भी बना रहा है। लेकिन मिस्र का चीन के करीब आना यह नहीं बताता कि वह अमेरिका से दूरी बना रहा है। काहिरा की रणनीति फिलहाल दोनों बड़ी ताकतों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपने विकल्प बढ़ाने की दिखती है। यही बात अमेरिका के लिए सबसे बड़ा संदेश है, मिडिल ईस्ट में प्रभाव बनाए रखने के लिए सिर्फ सैन्य ताकत पर्याप्त नहीं होगी। चीन जिस तरह निवेश, व्यापार और कूटनीति को एक साथ इस्तेमाल कर रहा है, उससे मुकाबले के लिए अमेरिका को भी अपनी आर्थिक और कूटनीतिक मौजूदगी मजबूत करनी होगी। (AP से इनपुट्स के साथ)
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