क्या ‘ड्यूटी सेक्स’ से मजबूत होता है रिश्ता या अंदर से खोखला हो जाता है इंसान? क्यों बिना इच्छा इंटीमेट हो रहीं महिलाएं

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Duty Sex in relationships : आज के दौर में रिश्ते सिर्फ प्यार और भरोसे के सहारे नहीं, बल्कि कई बार समझदारी और समझौतों के ताने-बाने पर टिके होते हैं. हाल ही में रिश्तों और सेक्स लाइफ को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली स्टडी सामने आई है. इस रिसर्च में यह बात सामने आई है कि कई महिलाएं बिना किसी शारीरिक इच्छा या सेक्सुअल डिजायर (Sexual Desire) के भी अपने पार्टनर के साथ इंटीमेट होती हैं. इसे आसान भाषा में ‘ड्यूटी सेक्स’ (Duty Sex) या ‘मर्सी सेक्स’ कहा जाता है. आखिर महिलाएं ऐसा क्यों करती हैं? आइए जरिए पूरी सच्चाई.

क्या कहती है ‘जर्नल ऑफ सेक्स एंड मैरिटल थेरेपी’ की यह स्टडी?
जर्नल ऑफ सेक्स एंड मैरिटल थेरेपी’ में छपी एक दिलचस्प रिसर्च के अनुसार, कई महिलाएं अपने रिश्ते को बचाने, पार्टनर को खुश रखने और वफादारी बनाए रखने के लिए बिना किसी खास इच्छा के भी शारीरिक संबंध बनाती हैं. इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए वैज्ञानिकों ने लगभग एक दशक तक ‘हाइपोएक्टिव सेक्सुअल डिजायर डिसऑर्डर’ (Hypoactive Sexual Desire Disorder) की दवाओं के ड्रग ट्रायल्स का विश्लेषण किया. चिकित्सा की भाषा में इसे कामेच्छा की पुरानी कमी कहा जाता है. इस दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन महिलाओं में सेक्स की इच्छा बेहद कम या ना के बराबर थी, वे भी महीने में औसतन दो से तीन बार अपने पार्टनर के साथ इंटीमेट होती थीं.
दवाइयों के ट्रायल्स और ‘मर्सी सेक्स’ का हैरान करने वाला सच
न्‍यूयार्क पोस्‍ट के मुताबिक, फार्मास्युटिकल कंपनियों द्वारा किए गए इन रैंडम और प्लेसबो-कंट्रोल ट्रायल्स में हजारों महिलाओं ने हिस्सा लिया था. नियमों के मुताबिक, इन दवाओं की सफलता का पैमाना इस बात को माना गया कि महिलाएं कितनी बार सेक्सुअल एक्टिविटी में शामिल होती हैं.

वाशिंगटन डीसी स्थित ‘इंटिममेडिसिन स्पेशलिस्ट्स’ के शोधकर्ताओं निकिता गुप्तान और जेम्स ए. साइमन ने जब इन आंकड़ों की गहराई से जांच की, तो एक अनोखा सच सामने आया.

उन्होंने पाया कि बिना किसी अंदरूनी इच्छा के भी संबंध बनाने का यह चलन काफी आम है. वैज्ञानिकों ने इसे ‘मर्सी सेक्स’ (Mercy Sex) का नाम दिया, जहां महिलाएं अपनी खुशी से ज्यादा रिश्ते की स्थिरता को प्राथमिकता देती हैं.

बिना किसी अंदरूनी इच्छा के भी संबंध बनाने का यह चलन काफी आम है.

बिना इच्छा के इंटीमेट होने के पीछे छिपे हैं इवोल्यूशनरी कारण-
सवाल यह उठता है कि आखिर महिलाएं बिना किसी शारीरिक तलब के ऐसा कदम क्यों उठाती हैं? शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसके पीछे इंसानी विकास (Evolution) और मनोविज्ञान से जुड़े कई कारण छिपे हैं. पुरुषों और महिलाओं की प्रजनन रणनीतियां (Reproductive Strategies) अलग-अलग होती हैं. पुरुष जहां कम समय में कई पार्टनर के साथ वंश बढ़ाने की प्रवृत्ति रखते हैं, वहीं महिलाएं बच्चों के पालन-पोषण के लिए स्थिरता और संसाधनों को प्राथमिकता देती हैं. ‘मर्सी सेक्स’ के जरिए वे यह सुनिश्चित करने की कोशिश करती हैं कि उनका पार्टनर किसी दूसरे की तरफ आकर्षित न हो और परिवार के साथ मजबूती से जुड़ा रहे.

भावनात्मक जुड़ाव और सामाजिक कंडीशनिंग की भूमिका
समाज में पुरुषों को आमतौर पर यह सिखाया जाता है कि सेक्स का मतलब सिर्फ शारीरिक संतुष्टि नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव (Emotional Closeness) भी है. स्टडी के अनुसार, जब महिलाएं बिना इच्छा के भी इस सहमति में शामिल होती हैं, तो वे अपने रिश्ते के इस भावनात्मक धागे को टूटने से बचा लेती हैं. हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी साफ किया है कि यह नियम सभी पर लागू नहीं होता; जैसे कि सेक्शुअल रिलेशन से बाहर की महिलाओं या समलैंगिक रिश्तों में इसके मायने अलग हो सकते हैं. फिर भी, यह प्रवृत्ति लंबे समय से चली आ रही सामाजिक अपेक्षाओं का एक बड़ा हिस्सा है.

क्या कहते हैं मनोवैज्ञानिक? ‘मर्सी सेक्स’ बनाम डिप्रेशन का खतरा
भले ही शुरुआत में यह पार्टनर को खुश करने का एक तरीका लगे, लेकिन मनोवैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि इसका मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ सकता है. ‘फोर्ब्स’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि कोई पार्टनर केवल झगड़े से बचने, निराशा टालने या बिना बात को बढ़ाए केवल समझौता करने के लिए ऐसा करता है, तो यह स्थिति खतरनाक हो सकती है.

अपनी इच्छाओं और भावनाओं को लगातार दबाते रहना (Suppressing Oneself) इंसान को अंदर से खोखला कर सकता है. लंबे समय तक ऐसा करने से महिलाओं में डिप्रेशन के लक्षण, मानसिक तनाव और कुंठा बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है.

क्या कहती है हालिया स्टडी? क्वालिटी बनाम क्वांटिटी पर बहस
एक अन्य स्टडी (‘जर्नल ऑफ सेक्स रिसर्च’, 2024) के अनुसार, ज्यादातर लोगों ने अपने मौजूदा रिश्तों में कभी न कभी ऐसी सहमति दी है जिसकी उनकी इच्छा नहीं थी. इन तमाम नए पहलुओं और रिसर्च के नतीजों से यह बात साफ हो जाती है कि रिश्तों की सफलता को मापने का पैमाना केवल ‘क्वांटिटी’ (फ्रीक्वेंसी) नहीं होना चाहिए, बल्कि ‘क्वांटिटी’ के साथ-साथ ‘क्वालिटी’ पर भी बराबर जोर दिया जाना चाहिए.

संतुलन है रिश्ते की असली चाबी
अंत में यही कहा जा सकता है कि रिश्ता प्यार, संवाद और आपसी सहमति से चलता है. अगर मजबूरी में किया गया यह काम आपकी मानसिक शांति और खुशी की कीमत पर हो रहा है, तो यह आपके अंदर के इंसान को धीरे-धीरे कमजोर कर सकता है. इसलिए, हर रिश्ते में खुलकर बात करना और एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना सबसे ज्यादा जरूरी है.

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