Highlights
- संसद का मॉनसून सत्र खत्म हुआ
- संसद सत्र चलाने में कितना होता है खर्च
- सत्र ना चले तो कितना होता है नुकसान
संसद का मॉनसून सत्र बुधवार 13 अगस्त को आखिरकार सत्ता पक्ष और विपक्ष की जिद की भेंट चढ़ गया। 20 जुलाई से शुरू हुआ मॉनसून सत्र 13 अगस्त तक चला, जिसमें 19 बैठकें निर्धारित की गईं थीं। इस सत्र में कम से कम 19 विधेयक पारित किए, जिनमें सात सिर्फ 36 मिनट में बिना किसी चर्चा के ही पारित हुए और अब मॉनसून सत्र खत्म होने के बाद लोकसभा-राज्यसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है। तमाम तरह की उथल-पुथल और बार बार अस्थिरता और राजनीतिक गतिरोध के बीच सत्र नहीं चलने से जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ वह है -संसद के उस समय का नुकसान और दूसरा आम जनता के पैसे का नुकसान।
एक सत्र चलाने में कितना खर्च आता है?
संसद में कामकाज में रुकावटों पर होने वाली चर्चाओं में अक्सर एक आंकड़ा बताया जाता है, जो है 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट। यह अनुमान 2012 का है, जब तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा था कि संसद चलाने में प्रति मिनट लगभग 2.5 लाख रुपये का खर्च आता है। इस तरह से देखें तो लोकसभा और राज्यसभा, दोनों के लिए लगभग 1.25-1.25 लाख रुपये। PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च ने भी कामकाज में रुकावटों से होने वाले वित्तीय खर्च का आकलन करते समय इसी आंकड़े का हवाला दिया है।

Image Source : INDIATVएक दिन में कितना खर्च
हालांकि यह एक पुराना अनुमान है, तो उस समय से लेकर अब तक 14 सालों में महंगाई और कीमतों में हुई बढ़ोतरी को ध्यान में रखें, तो असल में आज की लागत इससे कहीं ज़्यादा होगी। भारतीय संसद के सत्र को चलाने के अनुमानित खर्च का ब्योरा- लगभग ₹2.5 लाख प्रति घंटा यानी लगभग ₹1.5 करोड़ प्रति दिन यानी लगभग ₹9 करोड़ (दोनों सदनों की कुल 6-6 घंटे की कार्यवाही के आधार पर) जिसमें मानसून सत्र आमतौर पर 15 से 20 कार्य दिवसों (working days) का होता है। इस आधार पर, 15 से 20 दिन के मानसून सत्र का कुल खर्च लगभग ₹135 करोड़ से ₹180 करोड़ के बीच आता है।
इस खर्च में क्या-क्या शामिल है?
इस खर्च में सांसदों के वेतन और भत्ते, जिसमें दैनिक भत्ता (Per Diem), यात्रा खर्च और अन्य सुविधाएं शामिल हैं। संसद भवन का रखरखाव, जिसमें बिजली, पानी, सुरक्षा, उच्च तकनीक उपकरण और आईटी इन्फ्रास्ट्रक्चर शामिल है। कर्मचारियों का वेतन, जिसमें संसद सचिवालय, मार्शल, रिपोर्टर्स, अनुवादक और सुरक्षा कर्मियों का खर्च शामिल है। प्रसारण और सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स और सुरक्षा व्यवस्था।
(नोट: यह आंकड़ा आधिकारिक रूप से आवंटित वार्षिक बजट और संसदीय कार्य मंत्रालय के अनुमानों पर आधारित है)
इस तरह से देखें तो जब सांसद सदन को काम नहीं करने देते, तो संसद पर होने वाला खर्च-यानी उसकी इमारतों, स्टाफ़, सुरक्षा, टेक्नोलॉजी और दूसरे इंफ़्रास्ट्रक्चर पर होने वाला खर्च, तब भी जारी रहता है, जब तय किया गया विधायी कामकाज नहीं हो पाता।
Image Source : INDIATVकितना होता है नुकसान
हंगामे से होने वाले प्रभाव
- संसद के संचालन का खर्च देश के नागरिकों के टैक्स से आता है। जब हंगामा होता है, तो यह पैसा बिना किसी उत्पादक कार्य के खर्च हो जाता है और आर्थिक नीतियां और सुधार लटक जाते हैं या फिर बिना पर्याप्त बहस के जल्दबाजी में पारित करने पड़ते हैं।
- प्रश्नकाल (Question Hour) रद्द होने से सरकार की जवाबदेही तय नहीं हो पाती और जनता से जुड़े जरूरी मुद्दों पर चर्चा नहीं हो पाती।
- यदि किसी मानसून सत्र में हंगामे के कारण 50 घंटे का समय बर्बाद होता है, तो देश को सीधे तौर पर लगभग ₹75 करोड़ का वित्तीय नुकसान होता है।
प्रति नागरिक/टैक्सपेयर पर कितना असर पड़ता है?
- भारत की कुल आबादी के हिसाब से (140 करोड़ नागरिक) यदि पूरे मानसून सत्र का अनुमानित खर्च ₹150 करोड़ माना जाए, तो प्रति नागरिक यह खर्च लगभग ₹1.07 (एक रुपया सात पैसे) बैठता है।
- भारत में लगभग 8 करोड़ से 8.5 करोड़ लोग इनकम टैक्स रिटर्न भरते हैं।
- यदि केवल इस आबादी के हिसाब से देखें, तो एक मानसून सत्र को चलाने के लिए प्रति इनकम टैक्सपेयर लगभग ₹18 से ₹20 का खर्च आता है।
ऐसे समझिए गणित
- एक आम नागरिक के लिए नुकसान सिर्फ पैसों का नहीं होता, बल्कि अन्य रूपों में कहीं अधिक बड़ा होता है।
- आम इंसान जब आटा, तेल, मोबाइल रिचार्ज या कोई भी सामान खरीदता है, तो उस पर GST देता है। संसद इसी टैक्स के पैसे से चलती है।
- संसद न चलने से महंगाई, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा जैसे आम आदमी से जुड़े मुद्दों पर चर्चा नहीं हो पाती।
- जो विधेयक आम जनता को राहत या सुविधा देने के लिए बनाए जाते हैं, वे पास नहीं हो पाते।
- यानी आम इंसान का सीधे तौर पर जेब से ₹15–₹20 (टैक्सपेयर के रूप में) तो बर्बाद होता ही है, लेकिन उससे कई गुना बड़ा नुकसान उन नीतियों के रुकने से होता है जो उसके जीवन को बेहतर बना सकती थीं।
संसद ठप्प होने से क्या होता है नुकसान
- जब संसद ठप्प होती है, तो कई आर्थिक नीतियां और बजट से जुड़े फैसले अटक जाते हैं। इसके कारण सड़कों, अस्पतालों, और स्कूलों के निर्माण में देरी होती है, जिसकी प्रत्यक्ष कीमत आम नागरिक चुकाता है।
- जब सत्र स्थगित होता है, तो सांसद प्रश्नकाल (Question Hour) के जरिए सरकार से महंगाई, रोजगार और कृषि संकट पर सवाल नहीं पूछ पाते।मान लीजिए स्वास्थ्य सुरक्षा, शिक्षा अधिकार, या उपभोक्ता राहत से जुड़ा कोई नया बिल पास होना था; सत्र हंगामे की भेंट चढ़ने से वह कानून सालों तक लटक जाता है।
- जब सत्र का समय खत्म होने वाला होता है और हंगामा जारी रहता है, तो सरकारें अक्सर कई महत्वपूर्ण बिल बिना किसी चर्चा या बहस के 5-10 मिनट में पास कर देती हैं।
- इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक को होता है, क्योंकि किसी भी कानून के नफा-नुकसान पर सही तरीके से विचार ही नहीं हो पाता।
संक्षेप में कहें तो, संसद न चलने से आम नागरिक को, वित्तीय स्तर पर उनके टैक्स के करोड़ों रुपयों की सीधी बर्बादी होती है। व्यक्तिगत स्तर पर उनकी समस्याओं (महंगाई, सड़क, सुरक्षा) पर सरकार की जवाबदेही तय नहीं हो पाती। जिस संसद का समय रुकावटों में बर्बाद होता है, उसके पास कानून पास होने के समय भी विचार-विमर्श के लिए कम समय बच सकता है। इसीलिए, लोकसभा और राज्यसभा के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के साथ मॉनसून सत्र का खत्म होना सिर्फ़ इस बात की कहानी नहीं है कि संसद ने कितने घंटे काम किया। ज़्यादा अहम सवाल यह है कि जिन घंटों में काम नहीं हो पाया, उनमें संसद क्या कर सकती थी।









