एक तरफ हम बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के नारे लगाते हैं. सोशल मीडिया पर बेटियों की कामयाबी पर गर्व जताते हैं. दूसरी तरफ आज भी ऐसे घर हैं, जहां बेटी का जन्म खुशियों की वजह नहीं, बल्कि ताने, अपमान और मानसिक प्रताड़ना का कारण बन जाता है. सवाल सिर्फ महाराष्ट्र के कोल्हापुर का नहीं है. सवाल उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद का भी है. एक जगह कथित तौर पर बेटी के जन्म के बाद एक मां की जिंदगी इतनी मुश्किल हो गई कि उसने अपनी जान दे दी.
दूसरी तरफ करोड़ों की संपत्ति के लिए एक बेटे ने अपने ही पिता को गोलियों से छलनी कर दिया. दोनों घटनाएं अलग-अलग हैं, लेकिन इनके पीछे छिपी सोच कहीं न कहीं एक जैसी है. वह सोच, जिसमें इंसानियत से ज्यादा अहमियत बेटे, संपत्ति और पितृसत्तात्मक मानसिकता को दी जाती है.
कोल्हापुर की घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में एक महीने की बच्ची के नामकरण समारोह की तैयारियां चल रही थीं. इसी बीच अस्मिता प्रतीकसिंह काटकर ने कथित तौर पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. उनकी मौत के बाद मायके पक्ष ने ससुराल वालों पर गंभीर आरोप लगाए हैं. पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी.
लेकिन एक सवाल जरूर खड़ा होता है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक नई मां, जिसकी गोद में एक महीने की बच्ची थी, वह जिंदगी छोड़ने को मजबूर हो गई? अगर जांच में यह साबित होता है कि बेटी के जन्म को लेकर उसे प्रताड़ित किया गया, तो यह केवल एक परिवार का अपराध नहीं होगा. यह पूरे समाज के चेहरे पर तमाचा होगा.
बेटी पैदा हुई… तो गुनहगार कौन?
आज भी देश के कई हिस्सों में बेटी के जन्म पर सबसे पहले मां को ही दोषी ठहराया जाता है. उसे ताने दिए जाते हैं कि “बेटा नहीं हुआ”, जबकि विज्ञान साफ कहता है कि बच्चे का लिंग तय करने में महिला की कोई भूमिका नहीं होती. इसके बावजूद सदियों पुरानी सोच आज भी जिंदा है.
यह विडंबना है कि चांद पर पहुंचने की बात करने वाला समाज आज भी बेटी पैदा होने पर बहू को कटघरे में खड़ा कर देता है. ऐसे ताने सिर्फ शब्द नहीं होते. ये धीरे-धीरे किसी महिला के आत्मसम्मान, मानसिक स्वास्थ्य और जीने की इच्छा को खत्म कर देते हैं.
गाजियाबाद की घटना बताती है कि सिर्फ बेटा होना भी समाधान नहीं
समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी मानता है कि बेटा होगा तो बुढ़ापे का सहारा बनेगा. लेकिन गाजियाबाद की घटना इस सोच को झकझोर देती है. मोदीनगर में कथित तौर पर करीब 150 करोड़ रुपये की संपत्ति को लेकर बेटे ने अपने ही पिता की गोली मारकर हत्या कर दी. आरोप है कि उसने पिता पर कई गोलियां चलाईं. पुलिस मामले की जांच कर रही है और कानूनी प्रक्रिया जारी है.
यह घटना सिर्फ एक हत्या नहीं है. यह उस सोच की भी हत्या है, जिसमें बेटों को परिवार की सबसे बड़ी पूंजी माना जाता है. अगर संपत्ति के लिए बेटा पिता की जान ले सकता है, तो फिर बेटे को ही परिवार का भविष्य मानने का तर्क कितना मजबूत रह जाता है?
बेटा चाहिए… लेकिन क्यों?
अगर ईमानदारी से पूछा जाए कि बेटे की चाहत आखिर क्यों है, तो जवाब अक्सर यही मिलेगा- वंश चलेगा, नाम रोशन होगा, बुजुर्गों का सहारा बनेगा और संपत्ति संभालेगा. लेकिन बदलते भारत की तस्वीर कुछ और कहती है. आज बेटियां माता-पिता का कारोबार संभाल रही हैं, बुजुर्ग मां-बाप की देखभाल कर रही हैं, अंतिम संस्कार कर रही हैं और हर उस जिम्मेदारी को निभा रही हैं, जिसे कभी सिर्फ बेटों से जोड़कर देखा जाता था. फिर भी अगर समाज बेटी को बोझ और बेटे को वरदान मानता है, तो समस्या बच्चों में नहीं, सोच में है.
असली लड़ाई कानून की नहीं, मानसिकता की है
दहेज विरोधी कानून हैं. घरेलू हिंसा के खिलाफ कानून हैं. महिलाओं की सुरक्षा के लिए तमाम प्रावधान हैं. संपत्ति में बेटियों को बराबरी का अधिकार भी मिल चुका है. फिर भी अगर एक महिला को बेटी पैदा होने पर प्रताड़ना झेलनी पड़े या परिवार संपत्ति के लिए खून का रिश्ता भूल जाए, तो साफ है कि कानून अकेले समाज नहीं बदल सकते. बदलाव घर की परवरिश, शिक्षा और बराबरी की सोच से आएगा.
हमें तय करना होगा कि अगली पीढ़ी को क्या सिखाएंगे
बच्चों को यह सिखाना होगा कि इंसान की कीमत उसके लिंग से तय नहीं होती, उनके व्यवहार से मिलता है. अगर हम आज भी बेटियों को कम और बेटों को ज्यादा महत्व देंगे, तो आने वाली पीढ़ियां भी यही जहर विरासत में लेकर आगे बढ़ेंगी.
कोल्हापुर और गाजियाबाद की घटनाएं दो अलग-अलग राज्यों की खबरें जरूर हैं, लेकिन दोनों हमें एक ही आईना दिखाती हैं. एक तरफ बेटी के जन्म पर कथित प्रताड़ना का सवाल है, दूसरी तरफ संपत्ति के लिए बेटे पर पिता की निर्मम हत्या का आरोप. दोनों घटनाएं हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं.
इन मामलों की जांच पूरी होने के बाद ही कानूनी जिम्मेदारी तय होगी और हर आरोपी को कानून के दायरे में निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है. लेकिन एक सामाजिक सच इससे अलग भी है. जब तक हम बेटा-बेटी के बीच फर्क करना नहीं छोड़ेंगे, जब तक बच्चों को इंसानियत से ज्यादा विरासत का महत्व सिखाएंगे, तब तक ऐसी खबरें बदलती रहेंगी, लेकिन उनका दर्द नहीं. अब समय आ गया है कि हम यह सवाल खुद से पूछें, ‘हमें वास्तव में बेटा चाहिए, या एक अच्छा इंसान?’
नोट: यह लेख उपलब्ध प्रारंभिक रिपोर्टों और सार्वजनिक जानकारी के आधार पर सामाजिक मुद्दे पर टिप्पणी है. कोल्हापुर मामले में महिला की मौत और गाजियाबाद मामले में हत्या की जांच जारी है. आरोपों की पुष्टि संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी.









