नामी विश्वविद्यालयों के नाम पर बोगस डिग्री, मार्कशीट और अन्य शैक्षणिक दस्तावेज तैयार कर लाखों रुपये में बेचने वाले गिरोह का महाराष्ट्र के चंद्रपुर की दुर्गापुर पुलिस ने पर्दाफाश किया है। पुलिस ने इस फर्जीवाड़े के मास्टरमाइंड परिमल बाबूराव गौरकर और उसके साथी अक्षय खोब्रागडे को नागपुर के एक होटल से गिरफ्तार कर लिया है। दोनों की गिरफ्तारी के साथ इस मामले में अरेस्ट किए गए आरोपियों की संख्या अब तीन हो गई है।
ग्राहकों को मास्टरमाइंड तक पहुंचाते थे एजेंट
बता दें कि दो दिन पहले पुलिस के हत्थे चढ़े परिमल के साथी और कथित एजेंट वैभव सोनुले से हुई पूछताछ में इस फर्जी डिग्री रैकेट की परतें खुलती चली गईं। पुलिस के अनुसार, एजेंट ग्राहकों की तलाश कर उन्हें गौरकर तक पहुंचाते थे। इसके बाद ग्राहक की मांग के मुताबिक, नागपुर, अमरावती, गोंडवाना सहित तमाम विश्वविद्यालयों के नाम पर फर्जी डिग्री और मार्कशीट तैयार की जाती थीं। इन दस्तावेजों के बदले 5 से 10 लाख रुपये तक की मोटी रकम वसूली जाती थी।
नौकरी में फर्जी डिग्री के इस्तेमाल की आशंका
पुलिस को आशंका है कि इन बोगस प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल नौकरी हासिल करने, शैक्षणिक प्रवेश और पदोन्नति जैसे महत्वपूर्ण कामों के लिए किया गया हो सकता है। अब जांच का सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस नेटवर्क से कितने लोगों ने फर्जी डिग्रियां खरीदीं और इनका इस्तेमाल किन संस्थानों में किया गया।
जांच में कई और चेहरे हो सकते हैं बेनकाब
मास्टरमाइंड परिमल बाबूराव गौरकर की गिरफ्तारी के बाद पुलिस अब उससे पूछताछ कर रही है। उसके जरिए फर्जी डिग्री तैयार करने वाले लोगों, दलालों, खरीदारों और इस नेटवर्क से जुड़े अन्य आरोपियों तक पहुंचने का प्रयास किया जा रहा है। पुलिस जांच आगे बढ़ने के साथ इस फर्जीवाड़े में शामिल कई और चेहरों के बेनकाब होने की संभावना है।
न्यायिक हिरासत में भेजे गए आरोपी
इस मामले में इससे पहले परिमल गौरकर के साथी और कथित एजेंट वैभव सोनुले को गिरफ्तार किया गया था। शुक्रवार को उसकी पुलिस रिमांड समाप्त होने के बाद उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
नकली डिग्री के बदले वसूले जाते थे 5 से 10 लाख रुपये
पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि ग्राहकों की मांग के अनुसार, नागपुर, अमरावती और गोंडवाना विश्वविद्यालय सहित महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान और अन्य राज्यों के विश्वविद्यालयों के नाम पर फर्जी डिग्री, मार्कशीट और अन्य प्रमाणपत्र तैयार किए जाते थे। इन नकली दस्तावेजों के बदले ग्राहकों से 5 से 10 लाख रुपये तक वसूले जाते थे। अब पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि इस फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के कारोबार का नेटवर्क आखिर कितना बड़ा है और इसके तार कहां-कहां तक जुड़े हैं।
(इनपुट- मिलिंद दिंडेवार)
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