कर्नाटक की एक खौफनाक वारदात ने समाज को सुन्न कर दिया है, जहाँ महज नाइट सूट पहनने पर एक पति ने पत्नी पर किरोसीन छिड़ककर उसे आग के हवाले कर दिया. वहीं एक दिन पहले ही एक और खबर ने लोगों सन्न कर दिया था जिसमें वेस्टर्न स्टाइल में प्रपोजल करने के बहाने बॉयफ्रेंड को लड़की ने जिंदा जला दिया था. ऐसी घटनाएं सभ्य समाज को झकझोर देने वाली हैं.
ऐसे मामले केवल अपराध नहीं, बल्कि उस गहरे मानसिक विकार और ‘कंट्रोलिंग बिहेवियर’ का परिणाम हैं, जहाँ पार्टनर को इंसान नहीं बल्कि जागीर समझ लिया जाता है. ऐसे में सवाल वही उठता है कि क्या कोई इतनी छोटी सी बात पर इतना हिंसक हो सकता है? एक फेमस स्विस मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग (Carl Jung) ने कहा था कि जहाँ प्रेम होता है, वहां सत्ता (Control) की कोई इच्छा नहीं होती; और जहाँ सत्ता की प्रधानता होती है, वहां प्रेम का अभाव होता है.
मनोविज्ञान के अनुसार, एक कंट्रोलिंग पार्टनर के लिए सामने वाला व्यक्ति ‘इंसान’ नहीं, बल्कि उसकी सत्ता का ‘प्रतीक’ होता है. यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के शोध बताते हैं कि जब एक पुरुष अपनी पत्नी के पहनावे पर हिंसक प्रतिक्रिया देता है, तो वह वास्तव में अपनी ‘फ्रैजाइल मस्कुलिनिटी’ (नाजुक पुरुषत्व) को बचाने की कोशिश कर रहा होता है. उसे डर होता है कि अगर महिला अपनी पसंद के कपड़े पहनेगी, तो उसकी ‘मर्जी’ और ‘दबदबे’ का किला ढह जाएगा. नाइट सूट यहाँ केवल एक ट्रिगर था; असली वजह वह असुरक्षा थी जो पत्नी की स्वतंत्रता से उपजी थी.
‘कैसे बनते हैं ऐसे लोग?’
‘सोशल लर्निंग थ्योरी’ के अनुसार, अगर किसी बच्चे ने बचपन में अपने पिता को माँ पर चीखते या उसे शारीरिक रूप से नियंत्रित करते देखा है, तो उसका अवचेतन मन इसे ही ‘मर्दानगी का मानक’ मान लेता है.
‘इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री’ के कई लेखों में यह स्पष्ट किया गया है कि ऐसी हिंसक मानसिकता अक्सर उन घरों में पनपती है जहाँ महिलाओं की स्वायत्तता को परिवार की ‘इज्जत’ से जोड़ दिया जाता है. ऐसे पुरुष अपनी पत्नी को अपनी संपत्ति (Property) समझने लगते हैं, और संपत्ति पर अपनी मर्जी थोपना उन्हें अपना जन्मसिद्ध अधिकार लगता है.
नार्सिसिज्म और सहानुभूति का अभाव
इस तरह के अपराधियों में अक्सर नार्सिसिस्टिक पर्सनालिटी डिसऑर्डर (NPD) के लक्षण पाए जाते हैं. उनके लिए अपनी भावनाएं और अपनी ‘बात का रखा जाना’ सर्वोपरि होता है.कर्नाटक की घटना के साथ-साथ, पिछले दिनों हुई वह वारदात जिसमें एक प्रेमिका ने अपने प्रेमी को ‘वेस्टर्न स्टाइल प्रपोजल’ के नाम पर जला दिया था, यह दिखाती है कि ‘टॉक्सिक बिहेवियर’ का कोई जेंडर नहीं होता. जब किसी के भीतर ‘एम्पैथी’ (सहानुभूति) पूरी तरह खत्म हो जाती है, तो वह अपने साथी के शरीर को जलते देख भी विचलित नहीं होता. उनके लिए अपनी ‘सनक’ को पूरा करना किसी भी जान से बड़ा हो जाता है.
खतरे के संकेत: क्या है ‘रेड फ्लैग’?
कानूनी विशेषज्ञ और रिलेशनशिप काउंसलर्स बार-बार चेतावनी देते हैं कि ऐसी बड़ी हिंसा कभी अचानक नहीं होती. इसके पीछे संकेतों की एक पूरी कतार होती है:
- आइसोलेशन: पार्टनर को उसके दोस्तों और मायके से दूर करने की कोशिश.
- गैसलाइटिंग: महिला को यह विश्वास दिलाना कि वह ‘गलत’ है और उसे ‘सुधरने’ की जरूरत है.
- कपड़ों और फोन पर पहरा: जिसे अक्सर ‘केयर’ (Care) कहकर पेश किया जाता है, वह वास्तव में डिजिटल और शारीरिक कैद की शुरुआत होती है.
समय है चुप्पी तोड़ने का
साड़ी बनाम नाइट सूट की यह जंग किसी एक घर की कहानी नहीं है. यह उस पितृसत्तात्मक ढांचे की उपज है जो आज भी महिलाओं के कपड़ों में ‘संस्कार’ ढूंढता है. कानून अपनी जगह काम करेगा, लेकिन समाज को यह समझना होगा कि कपड़ों पर पाबंदी ‘मर्यादा’ नहीं, बल्कि मानसिक बीमारी और अपराध की पहली सीढ़ी है.







